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नीति, निजता और नीयत

Tue, 22 Sep 2015 08:05 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 22 Sep 2015 08:05 PM IST
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Policy, privacy and intention

एनडीए सरकार ने काफी विरोध के बीच सोशल नेटवर्किंग की निगरानी से संबंधित राष्ट्रीय कूटलेखन नीति (एन्क्रिप्शन पॉलिसी) का मसौदा वापस ले लिया है, लेकिन निजता के हनन को लेकर शुरू हुई यह बहस जल्दी नहीं थमने वाली। अव्वल तो यही गले नहीं उतर रहा है कि आखिर ऐसा कोई मसौदा हर पहलू को परखे बिना जारी क्यों कर दिया गया था। वाट्स ऐप, फेसबुक, गूगल हैंगआउट, वाइबर जैसी सेवाएं देने वाली कंपनियों पर नियंत्रण और इनका इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं पर नियंत्रण दो भिन्न चीजें हैं।

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मसौदे में कहा गया था कि जो लोग इन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें 90 दिनों तक इनके जरिये भेजे जा रहे संदेशों को न केवल सुरक्षित रखना होगा, बल्कि बुलाए जाने पर जांच एजेंसियों के समक्ष भी उपस्थित होना होगा! यानी इससे दो व्यक्तियों के बीच वाट्स ऐप या ऐसी ही किसी सेवा के जरिये किया गया नितांत निजी संवाद भी निगरानी के दायरे में आ जाता। निश्चय ही सोशल नेटवर्किंग साइट्स और त्वरित संवाद के ऐसे साधनों के दुरुपयोग के मामले भी सामने आए हैं। इनके जरिये सांप्रदायिक हिंसा फैलाने की कोशिशें भी हुई हैं। यह भी सच है कि सोशल नेटवर्किंग की सेवाएं देने वाली कई कंपनियों के सर्वर देश से बाहर हैं, ऐसे में उनकी जवाबदेही तय करने के लिए उन्हें भारतीय कानूनों के दायरे में लाना जरूरी है। पर इसकी वजह से अपने ही नागरिकों को शक के दायरे में लाना जायज नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी कोई भी कोशिश निजता और संविधान प्रदत नागरिक अधिकारों के हनन के प्रयास के तौर पर ही देखी जाएगी।
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और फिर यह अजीब बात है कि इंटरनेट बैंकिंग तथा ऑनलाइन भुगतान सेवाओं को एक ओर बढ़ावा देने की बात की जाती है, दूसरी ओर ऐसी कोशिशें भी दिखती हैं, जिसकी वजह से लोग इन सेवाओं के इस्तेमाल से परहेज कर सकते हैं। संतोष की बात यह है कि केंद्रीय संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने स्वीकार किया है कि मसौदे में कई अवांछित बातें हैं। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि देश में साइबर कानून के पुख्ता नहीं होने से साइबर अपराधों को नियंत्रित नहीं किया जा सक रहा है। यह भी सच है कि कई देशों ने एन्क्रप्शिन पॉलिसी बना रखी है; मगर ऐसी किसी नीति से सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठने चाहिए।
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