खेल से खिलवाड़

Vikrant Chaturvedi Updated Fri, 07 Dec 2012 12:27 AM IST
playing with game
लंदन ओलंपिक में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले भारतीय एथलीट अगर अगले ओलंपिक में भाग नहीं ले पाएं, तो बहुत हैरानी नहीं होगी। दरअसल भारतीय ओलंपिक संघ और सरकार ने ओलंपिक की भावना के साथ लगातार जिस तरह खिलवाड़ किया, उसी का नतीजा ओलंपिक बिरादरी से निष्कासन के रूप में सामने आया है।

यानी अब हम दक्षिण अफ्रीका, अफगानिस्तान, सूडान और कुवैत जैसे देशों की श्रेणी में आ गए हैं, जो इससे पहले अलग-अलग कारणों से ओलंपिक बिरादरी से बाहर हुए थे। इस राष्ट्रीय शर्म के लिए ओलंपिक संघ जितना दोषी है, सरकार उससे कम जिम्मेदार नहीं।

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने चुनाव से पहले ही कह दिया था कि राष्ट्रमंडल घोटाले से जुड़े दागियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद ललित भनोट न सिर्फ संघ के नए महासचिव के तौर पर चुने गए, बल्कि नवनिर्वाचित अध्यक्ष अभय चौटाला उनके चयन को सही ठहरा रहे थे!​ यह वही भनोट हैं, जो राष्ट्रमंडल घोटाले में अपनी लिप्तता के कारण जेल में थे।

जाहिर है, यह चुनाव ओलंपिक समिति की निष्पक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था। दूसरी ओर, सरकार ओलंपिक संघ की स्वायत्तता खत्म करने पर तुली थी। इसी का नतीजा था कि संघ के चुनाव ओलंपिक चार्टर के बजाय सरकार की खेल संहिता के मुताबिक हुए। मानो यही काफी न हो, नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट बिल लाकर भी उसने प्रकारांतर से ओलंपिक संघ पर दबाव बनाया।

अदालत के निर्देश के बाद तो ओलंपिक संघ के सामने खेल संहिता के तहत चुनाव कराने के सिवा कोई चारा ही नहीं था। पूछना ही चाहिए कि जो सरकार अब तक खेलों के विकास के लिए कोई मुकम्मल नीति नहीं बना पाई, जो खेल संघों को राजनेताओं और नौकरशाहों के चंगुल से मुक्त कर पूर्व खिलाड़ियों के अधीन नहीं कर पाई, वह ओलंपिक संघ की स्वायत्तता खत्म कर आखिर क्या साबित करना चाहती है।

खेल के मामले में पहले ही हमारी छवि अच्छी नहीं है, तिस पर यह अप्रिय प्रसंग तो और भी साख को मटियामेट करने वाला है। क्या उम्मीद करें कि यह शर्म हमारे खेलों का स्तर ऊपर उठाने और खेल संघों को पारदर्शी बनाने की दिशा में प्रेरित करेगा!

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