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मरीज घर बैठे कर सकता है डायलिसिस
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
Updated Tue, 25 Nov 2014 03:10 AM IST
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पीजीआई के मेडिसन, सर्जरी व नेफ्रोलॉजी विभाग ने पहली बार एक मरीज की सफल क्रोनिक एंबुलेटरी पेरीटोनियल डायलिसिस (सीएपीडी) की है।
इससे किडनी के अन्य मरीजों के लिए भी उम्मीद की किरण जगी है। गुर्दा रोगियों को अब डायलिसिस के लिए अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत नहीं पडे़गी।
मरीज खुद घर बैठे ही अपने एक सहयोगी के साथ डायलिसिस कर सकता है व सामान्य रूप से कामकाज कर सकेगा।
सोनीपत के वेस्ट रामनगर निवासी प्रवेश कुमार (33) को पेरीटोनियल डायलिसिस करने के लिए तैयार कर दिया है। इसके लिए मेडिसन विभाग के डॉ. एच. के. अग्रवाल, सर्जरी के डॉ. ए. आर. बंसल व नेफ्रोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आर. के. यादव ने अहम भूमिका निभाई है। मरीज के पेट में 13 सेमी की केथेटर ट्यूब फिक्स की है, जो बाहर की तरफ 6 सेमी निकाली गई है। इस ट्यूब के जरिए मरीज के पेट में पेरीटोनियल डायलिसिस फ्लइड (पीडीएफ) डाला जाएगा, जो छह घंटे पेट के अंदर रहेगा, इसके बाद इसे बाहर निकाल दिया जाएगा। यह प्रक्रिया दिन में तीन बार करनी होगी। डॉ. यादव ने बताया कि इस तकनीक में मरीज को सिर्फ सफाई का ध्यान रखना होगा। यह सामान्य प्रक्रिया है, इससे शरीर में कोई बदलाव नहीं आता।
वजह और लक्षण
प्रदेश में 1000 में से एक किडनी रोगी है। इसकी बड़ी वजह शुगर, बीपी व संक्रमण है। इस बीमारी का लक्षण कमजोरी, भूख कम लगना, उल्टी का मन, शरीर में सुजन, रक्त न बनना, काम में मन न लगना है। दिमाग का संतुलन बिगड़ना, फेफड़ों व पेट में पानी बनना लक्षण है।
हीमो डायलिसिस का तरीका
किडनी रोगियों का अब तक हीमो डायलिसिस से उपचार किया जाता रहा है। इसमें खून की सफाई की जाती है। इसके लिए हाथ की नस में फिसुला लगाई जाती है। इसमें कृत्रिम मेमोरन डाला जाता है। जिससे मरीज का रंग काला पड़ जाता है। इसके साथ ही इस विधि से हर तीसरे मरीज को काला पीलिया होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके लिए सप्ताह में औसतन तीन बार अस्पताल आना पड़ता है और डायलिसिस के लिए चार घंटे लगते हैं।
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किडनी का मुख्य कार्य
यह शरीर में टोक्सिन व यूरिया जमा नहीं होने देती। इसके साथ ही यह पानी को फिल्टर करता है।
पेरीटानियल डायलेसिस का खर्च
केथेटर ट्यूब : लगभग छह हजार रुपये व पीडीएफ का खर्च 10 से 15 हजार रुपये।
सुरेखा की हिम्मत को सराहा
चिकित्सकों की सफल सीएपीडी से मरीज की पत्नी सुरेखा जहां खुश हैं। वहीं, वार्ड 10 के चिकित्सक व स्टाफ उसके सेवा भाव को सराहते नहीं थकते। सुरेखा कहती हैं कि प्रवेश की नौकरी दिल्ली जल बोर्ड में थी, लेकिन ज्वाइन करने से पहले ही करंट लग गया। इसके चलते वे चलने फिरने में असहाय हो गए और एक साल से किडनी भी जवाब दे गई। वे सोनीपत टीकाराम कॉलेज में बतौर लिपिक कार्यरत हैं। वह पति के डायलिसिस के लिए यहां बार-बार आकर परेशान हो गई थीं, लेकिन अब चिकित्सकों ने उसे घर पर ही डायलिसिस करने की विधि बता दी है, जो काफी आसान है।
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देश की स्थिति :
80 फीसदी को समय पर बीमारी का पता नहीं चलता।
90 फीसदी उपचार नहीं करा पाते।
देश में दवा बीमारी के हिसाब से नहीं मिलती।
दर्द निवारक दवा को साधारण रूप से इस्तेमाल करना।
10 फीसदी मरीज कराते हैं ट्रांसप्लांट व 90 फीसदी कराते हैं डायलिसिस।
10 फीसदी मरीजों की होती है पेरीटोनियल डायलिसिस।
बचाव
बीपी व शुगर की समय पर जांच।
दर्द की दवा के सेवन से बचें।
पेट में सुजन होने पर जांच।
लगातार उल्टी होने पर जांच।
यूरिया क्रीटीन की जांच।
किडनी ट्रांसप्लांट पर खर्च
दो से ढाई लाख रुपये सरकारी संस्थानों में।
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इससे किडनी के अन्य मरीजों के लिए भी उम्मीद की किरण जगी है। गुर्दा रोगियों को अब डायलिसिस के लिए अस्पताल में दाखिल होने की जरूरत नहीं पडे़गी।
मरीज खुद घर बैठे ही अपने एक सहयोगी के साथ डायलिसिस कर सकता है व सामान्य रूप से कामकाज कर सकेगा।
सोनीपत के वेस्ट रामनगर निवासी प्रवेश कुमार (33) को पेरीटोनियल डायलिसिस करने के लिए तैयार कर दिया है। इसके लिए मेडिसन विभाग के डॉ. एच. के. अग्रवाल, सर्जरी के डॉ. ए. आर. बंसल व नेफ्रोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आर. के. यादव ने अहम भूमिका निभाई है। मरीज के पेट में 13 सेमी की केथेटर ट्यूब फिक्स की है, जो बाहर की तरफ 6 सेमी निकाली गई है। इस ट्यूब के जरिए मरीज के पेट में पेरीटोनियल डायलिसिस फ्लइड (पीडीएफ) डाला जाएगा, जो छह घंटे पेट के अंदर रहेगा, इसके बाद इसे बाहर निकाल दिया जाएगा। यह प्रक्रिया दिन में तीन बार करनी होगी। डॉ. यादव ने बताया कि इस तकनीक में मरीज को सिर्फ सफाई का ध्यान रखना होगा। यह सामान्य प्रक्रिया है, इससे शरीर में कोई बदलाव नहीं आता।
वजह और लक्षण
प्रदेश में 1000 में से एक किडनी रोगी है। इसकी बड़ी वजह शुगर, बीपी व संक्रमण है। इस बीमारी का लक्षण कमजोरी, भूख कम लगना, उल्टी का मन, शरीर में सुजन, रक्त न बनना, काम में मन न लगना है। दिमाग का संतुलन बिगड़ना, फेफड़ों व पेट में पानी बनना लक्षण है।
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हीमो डायलिसिस का तरीका
किडनी रोगियों का अब तक हीमो डायलिसिस से उपचार किया जाता रहा है। इसमें खून की सफाई की जाती है। इसके लिए हाथ की नस में फिसुला लगाई जाती है। इसमें कृत्रिम मेमोरन डाला जाता है। जिससे मरीज का रंग काला पड़ जाता है। इसके साथ ही इस विधि से हर तीसरे मरीज को काला पीलिया होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके लिए सप्ताह में औसतन तीन बार अस्पताल आना पड़ता है और डायलिसिस के लिए चार घंटे लगते हैं।
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किडनी का मुख्य कार्य
यह शरीर में टोक्सिन व यूरिया जमा नहीं होने देती। इसके साथ ही यह पानी को फिल्टर करता है।
पेरीटानियल डायलेसिस का खर्च
केथेटर ट्यूब : लगभग छह हजार रुपये व पीडीएफ का खर्च 10 से 15 हजार रुपये।
सुरेखा की हिम्मत को सराहा
चिकित्सकों की सफल सीएपीडी से मरीज की पत्नी सुरेखा जहां खुश हैं। वहीं, वार्ड 10 के चिकित्सक व स्टाफ उसके सेवा भाव को सराहते नहीं थकते। सुरेखा कहती हैं कि प्रवेश की नौकरी दिल्ली जल बोर्ड में थी, लेकिन ज्वाइन करने से पहले ही करंट लग गया। इसके चलते वे चलने फिरने में असहाय हो गए और एक साल से किडनी भी जवाब दे गई। वे सोनीपत टीकाराम कॉलेज में बतौर लिपिक कार्यरत हैं। वह पति के डायलिसिस के लिए यहां बार-बार आकर परेशान हो गई थीं, लेकिन अब चिकित्सकों ने उसे घर पर ही डायलिसिस करने की विधि बता दी है, जो काफी आसान है।
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देश की स्थिति :
80 फीसदी को समय पर बीमारी का पता नहीं चलता।
90 फीसदी उपचार नहीं करा पाते।
देश में दवा बीमारी के हिसाब से नहीं मिलती।
दर्द निवारक दवा को साधारण रूप से इस्तेमाल करना।
10 फीसदी मरीज कराते हैं ट्रांसप्लांट व 90 फीसदी कराते हैं डायलिसिस।
10 फीसदी मरीजों की होती है पेरीटोनियल डायलिसिस।
बचाव
बीपी व शुगर की समय पर जांच।
दर्द की दवा के सेवन से बचें।
पेट में सुजन होने पर जांच।
लगातार उल्टी होने पर जांच।
यूरिया क्रीटीन की जांच।
किडनी ट्रांसप्लांट पर खर्च
दो से ढाई लाख रुपये सरकारी संस्थानों में।