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पासवान की वापसी

Fri, 28 Feb 2014 08:03 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 28 Feb 2014 08:03 PM IST
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paswan to return back

रामविलास पासवान पिछले लोकसभा चुनाव में अपनी सीट तक नहीं बचा सके थे, इसके बावजूद भाजपा और उनकी लोक जनशक्ति पार्टी के बीच हुआ गठबंधन बिहार की जातिवादी राजनीति के गणित के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। इस अचूक अवसरवादी राजनीति के समय में सिद्धांत और वैचारिक गठजोड़ की बात बेमानी लगती है, लिहाजा यह सवाल ही अप्रासंगिक हो जाता है कि 2002 के गुजरात दंगों को वजह बताकर राजग से अलग होने वाले पासवान आज नरेंद्र मोदी की रहनुमाई स्वीकार करने के लिए क्यों तैयार हो गए?

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वास्तव में राजनीति के हाशिये पर चल रहे पासवान के लिए खुद को प्रासंगिक बनाए रखने का इससे अच्छा कोई और मौका नहीं हो सकता था। उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। भाजपा के साथ गठजोड़ करने के बाद वह खुद अब नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के साथ बिहार की तीसरी बड़ी ताकत बन गए हैं। वरना लालू के साथ गठजोड़ कायम रखने या फिर नीतीश के पाले में जाने से उनकी पार्टी जूनियर पार्टनर ही बनी रहती।
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बेशक, भाजपा ने उन्हें सात सीटें दी हैं, लेकिन इससे उन्हें एक बड़ी पार्टी का साथ मिल गया है। पासवान की अभी भले ही लोकसभा में एक भी सीट नहीं है, मगर उनके पास छह फीसदी वोट हैं, जिस पर भाजपा की नजर है। यह वाकई देखने वाली बात होगी कि पासवान और भाजपा का गठजोड़ नीतीश कुमार के अति पिछड़ा वर्ग और महादलित तथा लालू प्रसाद यादव के एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को कितना नुकसान पहुंचा पाता है।
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दरअसल 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद से बिहार की राजनीति पूरी तरह से जाति और वर्ग के खांचे में बंट चुकी है और लालू, नीतीश और पासवान उसकी धुरी हैं। मगर कालांतर में पासवान की पार्टी की ताकत क्षीण होती चली गई और वह उनके कुनबे तक सिमट कर रह गई, जैसा कि इस समझौते में देखा जा सकता है कि उनके पाले में जो सात सीटें आई हैं, उनमें से तीन पर तो उनके परिवार का दावा है!


वहीं भाजपा आसन्न लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अपनी संभावनाओं को मजबूत करने के लिए दलितों के बीच अपना विस्तार करना चाहती है। वह पहले ही उपेंद्र कुशवाहा और उदित राज को भी अपने साथ जोड़ चुकी है, पासवान के साथ आने के बाद वह ऐसे दलों पर भी डोरे डाल सकती है, जिन्हें मोदी की वजह से किसी तरह का परहेज रहा हो।

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