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पारेख की नसीहत

Thu, 19 Feb 2015 07:53 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 19 Feb 2015 07:53 PM IST
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Parekh's edification

मोदी सरकार के प्रथम पूर्ण बजट से ठीक पहले प्रख्यात बैंकर दीपक पारेख की टिप्पणियां, चेतावनियां भले न हों, पर ध्यान से सुने जाने की मांग तो करती ही हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि इस सरकार के शुरुआती नौ महीनों में आर्थिक मोर्चे पर कोई बदलाव नहीं आया है।

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इस पर पूरी तरह यकीन करने का बेशक कारण नहीं है। इस दौरान कोयला खदानों और स्पेक्ट्रमों की नीलामी का फैसला किया गया, मनमाने ढंग से पर्यावरणीय मंजूरी देने की प्रवृत्ति खत्म करने की प्रतिबद्धता जताई गई और वोडाफोन की पुरानी देनदारी के मामले में उदारता दिखाते हुए विदेशी निवेशकों को सकारात्मक संदेश दिया गया। फिर सरकार के कामकाज का मूल्यांकन करने के लिए एक साल का समय तो चाहिए।
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इसके बावजूद दीपक पारेख को इस सरकार के आलोचक के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि वह मौजूदा सरकार की नीतियों और सुधारों से संबंधित कई पैनलों में शामिल हैं। वह सरकार के कामकाज को भीतर से देख रहे हैं, सिर्फ इसी कारण उनकी बातों का वजन नहीं है, बल्कि इसलिए भी है, क्योंकि पिछले काफी समय से वह उद्योग जगत की मुखर और आधिकारिक आवाज भी हैं; पिछली यूपीए सरकार की 'नीतिगत जड़ता' की ओर भी उन्होंने पहले-पहल ध्यान दिलाया था।
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वह तो यह भी कह रहे हैं कि एचडीएफसी बैंक को, जिसके वह चेयरमैन हैं, पूंजी बढ़ाने की जरूरत थी, पर एफआईपीबी (विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड) से मंजूरी मिलने में जितना समय लगा, उतना वक्त पूर्व की सरकारों के समय नहीं लगता था। बहुत संभव है, यह नौकरशाही की लेटलतीफी का नतीजा हो, पर जो सरकार बेहतर कार्यसंस्कृति के लिए नौकरशाही की मुश्कें कसने तक से न झिझके, दीपक पारेख की टिप्पणियां क्या उसके लिए संभलने का अवसर नहीं होना चाहिए?


कच्चे तेल के दाम घटने का सर्वाधिक लाभ भारत को हुआ है, विश्व बाजार में जिंसों के दाम घटे हैं, इसके बावजूद हमारी अर्थव्यवस्था को इसका लाभ नहीं मिला है और विदेशी निवेश के मोर्चे पर हताशा है। पारेख कह रहे हैं कि जब तक फैसले लेने में तेजी नहीं आती और लोगों के लिए कारोबार करना आसान नहीं बनाया जाता, तब तक मेक इन इंडिया का नारा सफल नहीं हो सकता। उम्मीद करनी चाहिए कि बदलाव के लिए बेचैन मोदी सरकार के लिए पारेख की नसीहत काम आएगी।

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