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पंचायती राज के दो दशक

Wed, 24 Apr 2013 10:17 PM IST
Updated Wed, 24 Apr 2013 10:17 PM IST
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panchayati raj

देश की ढाई लाख पंचायतों को सांविधानिक दर्जा दिलाने वाले पंचायती राज ऐक्ट-93 को अमल में आए दो दशक हो गए हैं, जिसे निश्चित ही एक बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है, हालांकि सत्ता का जिस तरह से विकेंद्रीकरण होना चाहिए था, वैसा अभी नहीं हो सका है।

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पंचायती राज व्यवस्था लागू करने के पीछे यही धारणा थी कि इससे निचले तबके का सशक्तीकरण होगा और समावेशी विकास को बल मिल सकेगा, लेकिन जो तस्वीर हमारे सामने है, वह बहुत आश्वस्त नहीं करती।
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इस कानून के अस्तित्व में आने के बावजूद मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर भारत की स्थिति निचले क्रम पर ही बनी हुई है, तो इसका साफ मतलब है कि सत्ता के विकेंद्रीकरण का लाभ निचले तबके तक नहीं पहुंच सका है।
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राहुल गांधी पंचायतों और प्रधानों को मजबूत किए जाने की बात करते हैं और खुद प्रधानमंत्री ने पंचायती राज सम्मेलन में ऐसी ही बातें दोहराई हैं, मगर सवाल है कि यह काम करेगा कौन?

असल में पंचायतों को राजनीतिक हित साधने का जरिया बना दिया गया है, नतीजतन भ्रष्टाचार तक का विकेंद्रीकरण हो गया है, जैसा कि मनरेगा के मामले में देखा जा सकता है, जहां हजारों करोड़ रुपयों की अनियमितता की बात सामने आई है।

चिंता की बात यह भी है कि पंचायती राज संस्थाएं सत्ता के टकराव का नया केंद्र भी बन गई हैं, जिसके चलते कई जगहों पर बाहुबलियों द्वारा निचले तबके के निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों को उनके अधिकारों से ही वंचित कर दिया जाता है।

यही हाल महिलाओं का है, जिनके लिए बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित कई राज्यों ने पंचायतों में पचास फीसदी तक सीटें आरक्षित तो कर दी हैं, पर उनका सही मायने में सशक्तीकरण नहीं हो सका है। वे आज भी निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बन सकी हैं।

पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाने के लिए जरूरी है कि उन पर नौकरशाही का नियंत्रण भी कम हो, ताकि वे बिना दबाव के सही मायने में अपने हित में फैसले ले सकें।


इसके साथ ही पंचायत प्रतिनिधियों को समुचित प्रशिक्षण दिए जाने की भी जरूरत है, ताकि वे अपने अधिकारों के साथ जवाबदेही को भी समझ सकें। तभी पंचायती राज की सार्थकता साबित हो सकेगी।

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