रास्ता दिखाती पंचायत

Ashok Kumar Updated Tue, 25 Sep 2012 03:07 PM IST
panchayat showing way
गाजियाबाद के लोनी की चालीस गांव की पंचायत से ऐसी खबर आई है, जो बेतुके फरमान जारी करने वाली पंचायतों के बारे में आम धारणा को बदल सकती है। इस पंचायत ने तय किया है कि बेटों की शादियां तड़क-भड़क के बजाय सादगी से की जाएंगी और बैंडबाजा तथा आतिशबाजी जैसे बेजा खर्च नहीं किए जाएंगे, साथ ही हथियारों आदि का प्रदर्शन भी नहीं किया जाएगा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश या हरियाणा ही नहीं, देश भर में शादियां सामाजिक, आर्थिक और कई मौकों पर राजनीतिक हैसियत तक के प्रदर्शन का जरिया बन चुकी हैं। ऐसे में इस फैसले के दो संदेश बिलकुल साफ हैं, पहला, इसमें लड़की के माता-पिता की चिंता अंतर्निहित है, जिनके लिए बेटी की शादी किसी बोझ से कम नहीं, क्योंकि बारात-डीजे वगैरह का खर्च अंततः लड़की पक्ष को ही उठाना पड़ता है। दूसरा, यह कदम सामाजिक, खासतौर से आर्थिक असंतुलन को कम करने में मददगार साबित हो सकता है, क्योंकि शादियां एक नए तरह के वर्ग संघर्ष का जरिया भी बन चुकी हैं।

इससे पहले इसी पंचायत की प्रेरणा से युवाओं ने दहेज न लेने और शराब न पीने के संकल्प भी लिए हैं, जिससे उस समाज में हो रहे सकारात्मक बदलाव के संकेत मिलते हैं, जिसे वरना तो दकियानूस और पुरुष वर्चस्व के कारण ही जाना जाता रहा है। यह वाकई बड़ा परिवर्तन है, क्योंकि अभी कुछ दिन पहले ही बागपत की असारा पंचायत ने महिलाओं और युवाओं पर बंदिशें लगाकर मध्ययुगीन मानसिकता की याद दिला दी थी। वास्तव में लोनी अपवाद नहीं है, ज्यादा दिन नहीं हुए जब मुजफ्फरनगर की सोझी पंचायत ने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ फरमान सुनाया और उन डॉक्टरों को भी आड़े हाथ लिया था, जो इसके जरिये लैंगिक असंतुलन में भागीदार बन रहे हैं।

हरियाणा के महेंद्रगढ़ की एक पंचायत ने तो पंचायत के दायरे में होने वाली कन्या के नाम पर 5,000 रुपये का फिक्स्ड डिपॉजिट करने का फैसला भी किया है। पंचायतों से आ रहे ये फैसले राहत देते हैं और आश्वस्त करते हैं कि समाज के भीतर से ही रास्ता निकलता है। ये फैसले दूसरी पंचायतों और दूसरे समाजों के लिए भी नजीर बन सकते हैं। जाहिर है, सामाजिक बदलाव सिर्फ कानूनों के जरिये नहीं लाया जा सकता, इसके लिए समाज को खुद भी बदलना पड़ता है।

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