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दोहरा रुख छोड़े पाकिस्तान
नई दिल्ली
Updated Wed, 17 Dec 2014 08:45 PM IST
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आतंकवाद पर दोहरा रुख अपनाने के बावजूद हकीकत यह है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान पाकिस्तान भी आतंकवाद का शिकार रहा है। मगर पेशावर के आर्मी स्कूल में हुए हमले में जिस तरह से 132 बच्चों सहित 148 लोगों की तालिबान के हथियारबंद आतंकियों ने हत्या की, उसने वहां के पूरे जनमानस को उद्वेलित कर दिया है।
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इस हमले को 1947 में पाकिस्तान के गठन के बाद की सबसे भीषण 'राष्ट्रीय आपदा' बताया जा रहा है, जिससे वहां आम लोगों की सियासी दलों से नाराजगी और नाउम्मीदी को सहज ही समझा जा सकता है। संभवतः इसी दबाव का नतीजा है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके घनघोर प्रतिद्वंद्वी इमरान खान सहित अन्य सियासी दलों के नेताओं को एक साथ आकर इस हमले की न केवल निंदा करनी पड़ी है, बल्कि उन्हें पाकिस्तान की सरजमीं से दहशतगर्दों को पूरी तरह से खत्म करने का वायदा भी करना पड़ा है।
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पाकिस्तान के लिए यह वाकई परीक्षा की घड़ी है। लेकिन क्या पाकिस्तान वाकई आतंकवाद को पूरी तरह से खत्म करने के लिए तैयार है? नवाज शरीफ ने आतंकवाद के खात्मे के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाने का ऐलान करते हुए दो टूक कहा है कि 'अच्छे' और 'बुरे' तालिबान में कोई फर्क नहीं किया जा सकता। यह सुनने में अच्छा लगता है, मगर असल मुद्दा तो यही है कि व्यावहारिक रूप से वह इस पर कितना अमल कर पाएंगे?
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आखिर यह बात किसी से छिपी नहीं है कि तालिबान को खाद-पानी भी पाकिस्तान से ही मिलता रहा है। जिस उत्तर-पश्चिम वजीरिस्तान में यह हमला हुआ है, वहां इमरान खान की पार्टी की सरकार है, जिनका रुख पाकिस्तानी तालिबान के प्रति काफी उदार रहा है। नवाज शरीफ ने पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रीय नीति बनाने के वास्ते एक सर्वदलीय बैठक भी गठित करने का भी ऐलान किया है।
लेकिन ऐसी कोई भी पहल बेमानी होगी, यदि उसमें भारत में आतंकी गतिविधियों को संचालित करने वाले हाफिज सईद जैसे दहशतगर्दों के खिलाफ कार्रवाई की बात न हो। हाफिज सईद पर कार्रवाई की बात तो छोड़िए, उसने इस हमले के बाद एक बार फिर से भारत को धमकी दी है और पाकिस्तान में उसे कोई रोक भी नहीं रहा है! क्या पाकिस्तान यह स्वीकार करने को तैयार है कि आतंकी हमला कहीं भी हो, उसमें फर्क नहीं किया जा सकता?