गंभीर नहीं है पाकिस्तान
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लगभग एक साल में दूसरी बार पाकिस्तान से वार्ता टूटी है, तो इसके लिए पड़ोसी की जिद ही जिम्मेदार है। चूंकि पिछले साल विदेश सचिवों की बातचीत से पहले कश्मीरी अलगाववादियों से पाक उच्चायुक्त की मुलाकात को हमारी सरकार ने गंभीरता से लिया था, ऐसे में, पाकिस्तान को इस बार थोड़े संयम से काम लेना चाहिए था। इसके अलावा रूस के उफा में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने जिस घोषणापत्र पर दस्तखत किए थे, उसका पहला बिंदु साफ कहता है कि नई दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक में आतंकवाद से जुड़े तमाम मुद्दों पर बात होगी। पर इसकी अनदेखी कर पाकिस्तान दो शर्तें थोप रहा था-एक यह कि वह पहले हुर्रियत नेताओं से बात करेगा, दूसरा, कश्मीर पर भी चर्चा होगी।
जाहिर है, यह आपसी सहमति से पीछे हटना था। अगर पाकिस्तान को उफा घोषणापत्र पर आपत्ति थी, तो उसे उस पर दस्तखत नहीं करना चाहिए था। पर उफा में कश्मीर का चूंकि कोई सीधा जिक्र नहीं था, इसलिए पाकिस्तान में नवाज शरीफ की काफी आलोचना हुई। संघर्षविराम का निरंतर उल्लंघन और गुरदासपुर व उधमपुर जैसे नए इलाके में हमले उसकी इसी खीझ के नमूने थे। अलबत्ता आतंकी नावेद के पकड़े जाने और अब दाऊद इब्राहिम के पाकिस्तान में होने के अकाट्य सुबूत राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बैठक में इस्लामाबाद को बेनकाब करने के लिए काफी होते। इसलिए भी पाकिस्तान ने पीछे हटने का फैसला किया।
पाकिस्तान का आरोप है कि भारत उसके अंदरूनी इलाके में हिंसा फैला रहा है। अगर यह सच है, तो इस पर गंभीर बातचीत के लिए भारत आने के बजाय इस्लामाबाद ने उस कश्मीर के मुद्दे पर वार्ता तोड़ने का फैसला क्यों किया, जो भारत का अभिन्न हिस्सा है? अगर पाकिस्तान सचमुच आतंकवाद से पीड़ित है, जैसा कि वह दावा करता है, तो आतंकवाद पर चर्चा करने से वह भागता क्यों है? साफ है कि आतंकवाद पर बातचीत करने में वह गंभीर नहीं है। पाकिस्तान की शर्तों के आगे न झुककर हमारी सरकार ने बेशक ठीक किया है, पर यह भी सच है कि बातचीत करने के अलावा मसले का कोई हल नहीं है। अलबत्ता यह बैठक जिस कटुता के साथ रद्द हुई है, उसमें निकट भविष्य में वार्ता की कोई संभावना शायद ही दिखती है।