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विवादों के पद्म पुरस्कार

नई दिल्ली Updated Mon, 28 Jan 2013 09:18 AM IST
padma awards controversy
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अब हर साल पद्म पुरस्कारों की घोषणा होते ही उन्हें ठुकराने या चयन की आलोचना करने का जो ढर्रा बन चुका है, वह चिंतित करने वाला है। किसी को पुरस्कार न मिलने की हताशा है, तो किसी को पुरस्कार उसकी कुल उपलब्धि के मुकाबले कमतर लगता है! कुछ ऐसे भी हैं, जो अपनी ताजातरीन उपलब्धियों को पद्म सम्मानों में न बदलते देख दुखी हैं।
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एक ऐसे देश में यह सब बहुत त्रासद है, जहां अनेक उपलब्धियां बगैर पहचान और सम्मान के विस्मृति में गुम हो चुकी हैं। लेकिन हर साल चयन पर उठती उंगलियां ये भी बताती हैं कि पद्म पुरस्कार सचमुच अपनी चमक खो चुके हैं। चूंकि विगत में कई बार परंपरा से हटकर ये पुरस्कार सत्ता से नजदीकी रखने वालों को भी दिए गए हैं, शायद इसीलिए अब चयन पर उंगली उठाना आसान हो गया है, जो इन सम्मानों का असम्मान है। पर यह विडंबना ही है कि इसके बावजूद चयन का ढर्रा नहीं बदलता।

ये पुरस्कार कई बार किस तरह सिर्फ खानापूर्ति होते हैं, इसका ज्वलंत उदाहरण राजेश खन्ना हैं। हिंदी सिनेमा के इस पहले सुपर स्टार को मरणोपरांत पद्मभूषण दिया गया है। क्या वह जीवित रहते हुए इस सम्मान के हकदार नहीं थे! या बुढ़ापा और मौत ही किसी कलाकार को पुरस्कार के लायक बनाती है! दक्षिण की चर्चित पार्श्व गायिका एस जानकी को भारत रत्न से कम कुछ नहीं मिलना चाहिए, यह तो खैर नहीं कह सकते, लेकिन पद्मभूषण से सम्मानित करने की सूचना उन्हें अगर पहले दी गई होती, तो आज वैसी स्थिति पैदा नहीं होती, जैसी कुछ साल पहले सितारा देवी के साथ हुई थी।

पर अग्रिम सूचना देना या सहमति लेना तो दूर, यहां तो ऐसा भाव होता है, जैसे पुरस्कार देकर एहसान किया जा रहा हो। यहां तक कि कई बार सम्मान देने वालों के प्रति सामान्य शिष्टाचार तक नहीं बरता जाता। यह इसी देश में संभव है कि एक वयोवृद्ध साहित्यकार को पद्मभूषण लेने के लिए राष्ट्रपति भवन में तो बुलाया जाए, लेकिन कार्यक्रम में अकेले न जा सकने के कारण उन्हें घुसने न दिया जाए! सवाल उठता है कि बार-बार विवादों के बावजूद पद्म पुरस्कार देने का तरीका क्यों नहीं बदलता। अगर तरीका नहीं बदल सकते, तो बेहतर हो कि इसे बंद कर दिया जाए।
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