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दाल पर बवाल

नई दिल्ली Updated Mon, 19 Oct 2015 07:20 PM IST
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organically on pulses
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मानसून के कमजोर रहने और फिर बेमौसम बारिश की मार दलहन पर पड़ी है, जिसकी वजह से बाजार में अरहर दाल की कीमत रिकॉर्ड तोड़ते हुए 200 रुपये के पार पहुंच गई है। हैरानी की बात यह है कि जुलाई के आसपास ही यह अनुमान लगा लिया गया था कि इस वर्ष बाजार में दलहन की कमी हो सकती है, इसके बावजूद समय रहते उपाय नहीं किए गए।
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हालांकि सरकार ने पांच हजार टन अरहर आयात करने का फैसला ले लिया था, लेकिन उसकी मांग को देखते हुए यह अपर्याप्त था। फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर भारत सहित देश के बड़े हिस्से में अरहर दाल आम लोगों के दैनिक भोजन का हिस्सा है। असल में भारत में दालें प्रोटीन और पौष्टिकता का एक बड़ा स्रोत हैं। इनके बिना भोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। केवल अरहर की बात ही नहीं, उड़द और दूसरी दालों की कीमतें भी आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं। जबकि विगत पांच वर्षों के दौरान अरहर की कीमत 70 से 80 रुपये के आसपास स्थिर रही है।


बाजार का एक सामान्य नियम है कि जब आपूर्ति कम हो और मांग अधिक हो, तो कीमतें बढ़ने लगती हैं। ऐसे मौकों पर जमाखोरी भी बढ़ती है। दलहन के साथ भी यही हो रहा है। हालांकि अब केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत दालों के संग्रहण पर रोक लगा दी है, ताकि बाजार में दाल की उपलब्धता बढ़ाई जा सके। उसका यह संशोधित आदेश सितंबर, 2016 तक के लिए दालों, खाद्य तेलों और दलहन के संग्रहण करने की छूट देने वाले आदेश की जगह आया है।

असल में खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां और मॉलों वगैरह के जरिये खुदरा व्यापार करने वाले बड़े खिलाड़ी इस तरह का संग्रहण करते हैं। इसके अलावा सरकार ने तीस हजार टन अरहर भी किसानों से बाजार दाम में खरीदने और दालों पर आयात शुल्क खत्म करने तथा इसके निर्यात पर रोक लगाने जैसे कदम उठाए हैं।

इन उपायों के नतीजे तो आने वाले दिनों में दिखेंगे, मगर भोजन से जुड़ी बुनियादी वस्तुओं की जमाखोरी से कड़ाई से निपटने की जरूरत है, क्योंकि इसकी वजह से वास्तविक स्थिति का पता ही नहीं चलता। इसके साथ ही धान और गेहूं की तरह दलहन के उत्पादन के मामले में भी आत्मनिर्भर होने के उपायों पर विचार किया जाना चाहिए।

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