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अवसर और जोखिम
नई दिल्ली
Updated Mon, 09 Mar 2015 08:19 PM IST
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जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने दस दिन पहले जब पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार की कमान संभाली थी, तभी साफ था कि यह बेमेल गठबंधन है, जिसके पीछे कोई सैद्धांतिक सहमति नहीं, बल्कि तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियां कारक हैं।
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वास्तव में सरकार गठन के कुछ घंटे के बाद से ही मुफ्ती मोहम्मद सईद ने यही जतलाने की कोशिश की है कि भाजपा से गठबंधन करने का यह मतलब नहीं है कि वह केंद्र की कठपुतली की तरह काम करेंगे। अलगाववादियों, उग्रवादियों और पाकिस्तान को शांतिपूर्ण चुनाव का श्रेय देने की बात हो या फिर राजनीतिक बंदियों की रिहाई का मामला, वह अपने समर्थकों को संदेश देना चाहते हैं।
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अलगाववादी नेता और पत्थरबाजी की घटनाओं के आरोपी मसर्रत आलम की रिहाई को भले ही सईद कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बता रहे हैं, पर वह जानते हैं कि इससे जो संदेश निकलेगा, उसका महत्व जम्मू-कश्मीर से बाहर नहीं, बल्कि राज्य के भीतर ही कहीं अधिक है। मगर उनके इन कदमों से भाजपा की मुश्किल बढ़ती जा रही है, जिसके लिए यह गठबंधन गले की हड्डी बनता जा रहा है। यहां यह भी गौर करना चाहिए कि केंद्र में अपने बूते बहुमत हासिल करने के बाद से ही भाजपा मिशन जम्मू-कश्मीर के लिए जुटी हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ हुए गठबंधन में व्यक्तिगत रूप से दिलचस्पी ली थी और उनके शपथ ग्रहण समारोह में खुद शामिल भी हुए थे।
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कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा और उसके शीर्ष नेता पीडीपी की राजनीति से बखूबी वाकिफ हैं। बेशक, पीडीपी-भाजपा गठबंधन के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया गया है और राज्य में अनुच्छेद 370 और सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम जैसे मुद्दों को टाला गया है, लेकिन जिस तरह से दोनों दलों के बीच दूरियां बढ़ रही हैं, उससे लगता है कि देर-सबेर ये मुद्दे भी तनाव का कारण बन सकते हैं।
अच्छा होता कि टकराव के बजाय भाजपा और पीडीपी के नेता विवादास्पद मुद्दों को आपस में बात करके सुलझाने का प्रयास करते। मुफ्ती मोहम्मद सईद के लिए जम्मू-कश्मीर में खुद को राजनेता की तरह स्थापित करने का यह आखिरी मौका है, तो कॉपरेटिव फेडरलिज्म को आगे बढ़ाने वाले नरेंद्र मोदी के लिए भी यह एक बड़ा अवसर है।