प्याज सौ रुपये

नई दिल्ली Updated Wed, 23 Oct 2013 07:58 PM IST
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अतीत में एक बार महंगा प्याज दिल्ली में सरकार गिरा चुका है, इसलिए सौ रुपये प्रति किलो की ऊंचाई पर पहुंचा प्याज विधानसभा चुनाव से पहले राजधानी में विपक्ष के लिए अचूक हथियार भले ही हो, लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में प्याज की तेजी को कोसने के सिवा और कोई चारा नहीं है। प्याज में आई इस तेजी की एक बड़ी वजह प्राकृतिक दुर्योग है।
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देश के दो सबसे बड़े उत्पादक राज्यों, महाराष्ट्र और कर्नाटक में खेतों में पानी भर जाने के कारण प्याज निकालना मुश्किल हो गया है। बारिश के कारण उत्तर की मंडियों में प्याज की आवक भी कम है। लेकिन यह मानने का ठोस कारण नहीं दिखता कि अगले कुछ सप्ताहों में आपूर्ति सुधरने पर दाम सामान्य हो जाएंगे।
दरअसल जुलाई से सितंबर-अक्तूबर तक बाजार में रबी के प्याज की ही आपूर्ति होती है, जो गुणवत्ता में बेहतर होता है। लेकिन इस बार बारिश ने रबी प्याज के उत्पादन को प्रभावित किया था, लिहाजा कोल्ड स्टोरेजों में इस प्याज की उपलब्धता कम है। खरीफ के जिस नए प्याज से बाजार को उम्मीद है, वह ज्यादा दिनों तक नहीं चलता। एक तो बारिश ने खरीफ के प्याज को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, फिर इस बार महाराष्ट्र में इसका उत्पादन भी कम बताया जा रहा है। इसीलिए यह मानना थोड़ा कठिन है कि नए प्याज के बाजार में आते ही दाम घटने लगेंगे।
इस आशंका की एक वजह यह भी है कि आने वाले दिनों में प्याज की मांग निरंतर बढ़ती रहेगी। प्याज में आई इस तेजी के पीछे हमारे राजनेता भी कम जिम्मेदार नहीं। तीन महीने पहले कृषि मंत्री शरद पवार ने जब प्याज निर्यात की संभावना जताई थी, तब उसके पीछे खासकर महाराष्ट्र के उत्पादकों को राहत देने की उनकी मंशा साफ दिखती थी। इसी तरह अब अगले दो-तीन सप्ताहों में प्याज के दाम घटने से संबंधित उनका ताजा बयान त्योहारी सीजन में व्यापारियों को जमाखोरी के लिए प्रोत्साहित करे, तो आश्चर्य नहीं।

संभव है कि प्याज के आयात से फिलहाल स्थिति सुधर जाए, पर कड़वा सच यह है कि कृषि उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता रहने पर निर्यात करने और नतीजतन आपूर्ति घट जाने पर उसी उत्पाद का बढ़े दाम पर आयात करने की नीति का खामियाजा हम पिछले काफी समय से भुगत रहे हैं।
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