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धर्मनिरपेक्षता के नाम पर

Tue, 29 Apr 2014 08:00 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 29 Apr 2014 08:00 PM IST
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on the name of securalism

अपने सबसे मुश्किल चुनाव से गुजर रही कांग्रेस के भीतर जो उथल-पुथल है, उसी का नतीजा है कि ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वह नरेंद्र मोदी और भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए धर्मनिरपेक्ष और समान विचारधारा वाले दलों से हाथ मिला सकती है। सबसे पहले सलमान खुर्शीद, फिर जयराम रमेश और अब सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने कहा है कि पार्टी धर्मनिरपेक्ष मोर्चे को समर्थन करने के लिए तैयार है।

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यह अचानक नहीं है कि ठीक इसी समय माकपा महासचिव प्रकाश करात ने भी कहा है कि उनकी पार्टी तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की स्थिति में उसमें शामिल होने से गुरेज नहीं करेगी! कांग्रेस समान विचारधारा वाले जिन दलों की बात कर रही है, कमोबेश वे वही दल हैं, जो तीसरे मोर्चे या चौथे मोर्चे की सियासत करते रहे हैं। यह अलग बात है कि माकपा जिस तीसरे मोर्चे की पहल कर रही थी, वह आकार ही नहीं ले सका। हालत यहां तक हो गई कि तमिलनाडु में कम्युनिस्ट पार्टियों का जयललिता की अन्नाद्रमुक के साथ एक दशक से भी अधिक समय से चला आ रहा गठबंधन तक टूट गया। खुद जयललिता ममता बनर्जी के साथ मिलकर फेडरल फ्रंट की बात कर रही हैं।
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बेशक कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए ने लगातार दस वर्ष तक गठबंधन सरकार चलाई, पर देश की इस सबसे पुरानी पार्टी ने अपने समर्थन से चलने वाली किसी भी सरकार को कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया। फिर वह चौधरी चरण सिंह की सरकार रही हो या चंद्रशेखर की या फिर राष्ट्रीय मोर्चा सरकार। लाख टके का सवाल है कि क्या कांग्रेस खुद को बदलने को तैयार है। क्या 1996-98 के अनुभव के बावजूद तीसरे मोर्चे के दल कांग्रेस पर भरोसा करेंगे? और उन दलों से भी यह पूछा जा सकता है कि आखिर उनके बेमेल गठजोड़ पर जनता को भरोसा क्यों करना चाहिए?
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इस पूरी कवायद में भाजपा के लिए भी संदेश है कि वह सिर्फ राजनीतिक स्थायित्व के नाम पर नए सहयोगियों को नहीं जोड़ सकती, उसे समावेशी विकास का ठोस वायदा भी करना होगा। असल में भाजपा और मोदी पर हमले के लिए उनके विरोधियों को धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा सबसे कारगर लगता है और अभी चूंकि तीन दौर के चुनाव बाकी हैं, इसलिए इस बहस को कांग्रेस की रणनीति के तौर पर भी देखा जा सकता है।

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