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विकास और राम के नाम पर
नई दिल्ली
Updated Mon, 07 Apr 2014 09:06 PM IST
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वजह चाहे जो भी रही हो, भाजपा लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के शुरू होने के बाद ही अपना घोषणा पत्र जारी कर सकी! विगत कुछ वर्षों से वह भ्रष्टाचार, महंगाई, बदतर होती आर्थिक विकास दर, नीतिगत जड़ता और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लचर नेतृत्व को लेकर यूपीए पर हमलावर रही है।
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उसने घोषणापत्र में विकास और नए रोजगार पैदा करने के साथ ही यूपीए का मजबूत विकल्प देने का वायदा किया है। उसके विकास का मॉडल कमोबेश 'ब्रांड इंडिया' का वही मॉडल है, जिसके बारे में उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी सभाओं में जिक्र करते आए हैं। इसमें राज्य की भूमिका को सीमित कर निजी क्षेत्र और लोगों की भागीदारी बढ़ाने का वायदा है।
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पार्टी निवेश तो बढ़ाना चाहती है, मगर उसने सब्सिडी का बोझ कम करने की कोई क्रांतिकारी योजना पेश नहीं की है। उसने साफ किया है कि वह मल्टी ब्रांड खुदरा में एफडीआई के खिलाफ है, जिससे उसे विशाल असंगठित खुदरा क्षेत्र को आकर्षित करने में मदद मिलेगी। कांग्रेस की तरह भाजपा की नजर भी विशाल नव मध्यवर्ग पर है, जो अब राजनीतिक रूप से काफी मुखर हो रहा है।
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बुलेट ट्रेन, सर्वसुविधायुक्त 100 शहर बसाने, सभी राज्यों में एम्स की स्थापना जैसे वायदे उसके विकास मॉडल को प्रतिबिंबित करते हैं। हैरानी की बात है कि भाजपा अपने प्रचार अभियान में विकास और सुशासन पर खासा जोर देती दिखती है, मगर उसने राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 को खत्म करने जैसे अपने पारंपरिक मुद्दों को भी घोषणापत्र में जोड़कर विरोधियों को हमले का मौका दे दिया है।
उल्लेखनीय है कि 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के बाद से पार्टी के एजेंडे में ये मुद्दे शामिल रहे हैं। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में पार्टी ने एनडीए की खातिर इन मुद्दों को अलग रखा था। मोदी की अगुआई में संभावनाएं देख रही भाजपा कुछ नए-पुराने सहयोगियों को अपने साथ जोड़ने में सफल हुई है। वह अल्पसंख्यकों को भी साथ लेकर चलने का वायदा कर रही है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह विकास और हिंदुत्व के अपने पुराने मुद्दे के साथ कैसा तालमेल बिठाती है, और लोग उस पर कितना भरोसा करते हैं।