फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   ON the edge of coldwar

शीतयुद्ध के मुहाने पर

Tue, 18 Mar 2014 07:15 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 18 Mar 2014 07:15 PM IST
विज्ञापन
ON the edge of coldwar

राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के रूसी संसद के विशेष सत्र में क्रीमिया को लेकर दिए गए भाषण से स्पष्ट है कि वह इस प्रांत के रूस में विलय संबंधी मुद्दे पर जरा भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर यूरोपीय संघ, अमेरिका और जापान ने यूक्रेन से अलग होकर रूस में शामिल होने संबंधी क्रीमिया की संसद के जनमत संग्रह को खारिज कर दिया है और कुछ प्रतिबंधों के जरिये दबाव बढ़ा दिया है।

विज्ञापन


वहां जैसे हालात बन रहे हैं, उससे टकराव के जल्द खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। यह स्थिति दुनिया को एक और शीतयुद्ध की ओर धकेलती दिख रही है। इसमें दो राय नहीं कि क्रीमिया ऐतिहासिक रूप से रूस के अधिक करीब रहा है। 1954 में सोवियत संघ के दौर में ही रूस ने क्रीमिया को यूक्रेन को सौंप दिया था और फिर 1991 में विघटन के बाद मिखाइल गोर्बाचेव ने भी यह स्थिति कायम रहने दी। मगर पिछले वर्ष नवंबर में रूसी राष्ट्रपति पुतिन के वफादार यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यांकोविच के खिलाफ जो प्रदर्शन हुए, उसकी जड़ में नस्लीय, भौगोलिक और राजनीतिक कारणों के अलावा अर्थव्यवस्था से जुड़ी वजहें भी रही हैं।
विज्ञापन


यदि पुतिन यूरोपीय संघ को चुनौती देते दिख रहे हैं, तो उसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि यूरोपीय संघ के लिए रूस गैस और तेल का बड़ा स्रोत है। दूसरी ओर पश्चिमी दुनिया अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष और नाटो के जरिये यूक्रेन पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है और पुतिन के प्रयासों को उनकी विस्तारवादी नीति के रूप में ही देख रही है। उसे लगता है कि रूसी राष्ट्रपति यूरोपीय संघ के बरक्स एक मजबूत क्षेत्रीय ताकत बनना चाहते हैं। मगर इस टकराव में क्रीमिया की संप्रभुता दांव पर लग गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


जहां तक भारत की बात है, तो रूस और यूक्रेन से उसके पुराने रिश्ते हैं और अभी भी तकरीबन पांच हजार भारतीय छात्र वहां पढ़ रहे हैं। वह इस संकट पर फूंक-फूंककर कदम रख रहा है। एक और शीतयुद्ध किसी भी रूप में भारत सहित दुनिया के किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं होगा, क्योंकि ऐसा हुआ, तो इसका सीधा असर कच्चे तेल के दामों पर पड़ेगा और अंततः अर्थव्यवस्थाओं पर। भूलना नहीं चाहिए कि अमेरिका और यूरोप के अनेक देश अभी मंदी से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed