{"_id":"543f2248eb58ead28c51ada01dac015b","slug":"on-hopeful-journey","type":"story","status":"publish","title_hn":"उम्मीद भरे सफर पर","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
उम्मीद भरे सफर पर
नई दिल्ली
Updated Tue, 31 Dec 2013 08:04 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आज से शुरू हुआ नया वर्ष एक कैलेंडर के पुराने पड़ जाने भर से नया नहीं है, बल्कि उन उम्मीदों के कारण भी नया है, जो पिछले साल हासिल उपलब्धियों से पैदा हुई हैं। कंपकंपाती ठंड में सूरज बेशक साफ नजर नहीं आता, पर विगत एक साल में राजनीति से लेकर समाज तक में आया बदलाव हमें प्रेरणा भी दे रहा है और ऊर्जा भी।
विज्ञापन
आम आदमी पार्टी के आने से पहले भी इस देश में बड़े राजनीतिक बदलाव हुए हैं, लेकिन जड़ व्यवस्था के खिलाफ आम आदमी का आक्रोश इतने प्रभावी ढंग से इससे पहले शायद ही दिखा हो। विधानसभा चुनावों में ज्यादातर जगह भारी संख्या में मतदान इस जागरूकता का ही नतीजा है। न्यायपालिका तो पहले से ही न्याय दिलाने में आगे रही है, सीबीआई और कैग जैसी संस्थाएं भी पारदर्शिता की लड़ाई में अब पीछे नहीं हैं।
विज्ञापन
भारी जनदबाव के कारण ही संसद को पिछले साल अपराध कानून संशोधन, खाद्य सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण, पेंशन और लोकपाल जैसे विधेयक पारित करने पड़े। जो लोग 2012 में निर्भया के हक की लड़ाई को सड़कों पर ले आए थे, विगत वर्ष उन्हीं में से बहुतों को धारा 377 पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरोध में गली-कूचों में देखा गया। जो स्थापित राजनीतिक पार्टियां पहले कहती थीं कि भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रहा, अब वही दल अपने विवादास्पद फैसले पलटते दिखाई देते हैं।
विज्ञापन
लेकिन बहुत कुछ बदलना अभी शेष है। मसलन, सांप्रदायिक दंगे अब भी न सिर्फ कड़वी हकीकत हैं, बल्कि इन दंगों का लाभ उठाने की राजनीति भी उतनी ही सक्रिय है। इसी तरह औरतों के हक में उठती आवाजों के बीच शामली से लुधियाना तक लड़कियां तेजाबी हमले की जद में हैं। युवाओं की बढ़ती संख्या और शक्ति के बावजूद देश में उच्च शिक्षा की स्थिति ठीक नहीं, भोजन का अधिकार कानून के बावजूद कुपोषितों की संख्या बढ़ रही है, और मानव विकास की दिशा में तो ढंग की पहलकदमी तक नहीं की गई है।
चूंकि इस वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं, इसलिए केंद्र की सत्ता में एक ऐसी सरकार की अपेक्षा सबसे अधिक है, जो अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए तत्परता से कदम उठाए और जिसकी विदेश नीति महाशिक्त देश की बंधक होने के बजाय पड़ोसी देशों को साथ लेकर चलने की हो। कामना यही है कि वर्ष 2014 केवल 2013 की औपचारिक विदाई न हो, वरन सही अर्थों में बेहतर बदलाव का वाहक बने।