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संग्रहालय का अधिकारी

Updated Thu, 02 Apr 2015 09:00 PM IST
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खेमका ऐसे अकेले अधिकारी नहीं हैं, जिन्हें ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ रही है। मूल सवाल प्रशासनिक मशीनरी को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करने से जुड़ा है।
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हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने महज चार महीने के भीतर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के परिवहन विभाग से पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग में स्थानांतरण को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है, लेकिन यह मामला इतना सीधा है नहीं। व्हीसल ब्लोअर की ख्याति अर्जित कर चुके खेमका का 22 वर्ष के करियर में यह 46 वां स्थानांतरण है, जिससे समझा जा सकता है कि सूबे की सरकारों के साथ उनके रिश्ते किस तरह के रहे होंगे। उल्लेखनीय यह है कि उनके खिलाफ किसी तरह की गड़बड़ियां नहीं पाई गई हैं, बल्कि वह अपनी ईमानदारी के लिए सुर्खियों में आए हैं, क्योंकि उन्होंने नियमों और कायदों को लेकर ऊंचे और रसूखदार लोगों से टकराने में किसी तरह की हिचक नहीं दिखाई। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ के विवादित जमीन सौदे पर सवाल उठाने की वजह से उन्हें पिछली भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार ने पुरातत्व और संग्रहालय जैसे कम महत्व के विभाग में भेज दिया था। हैरत की बात है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने वाली भाजपा की मौजूदा सरकार को भी लगता है कि इस ईमानदार अधिकारी को आर्काइव में होना चाहिए! वास्तव में परिवहन विभाग में आयुक्त और सचिव रहते खेमका ने अवैध ट्रकों और ट्रेलरों के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी थी और ओवरसाइज वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल तक कर दी थी। हैरत नहीं होनी चाहिए कि मुख्यमंत्री खट्टर से असंतुष्ट बताए जाने वाले वरिष्ठ मंत्री अनिल विज ने खेमका का साथ देने का ऐलान किया है। जाहिर है, यह मामला वैसा नहीं है, जैसा बताया जा रहा है। मगर इस घटनाक्रम को व्यापक रूप से देखने की जरूरत है, क्योंकि खेमका ऐसे अकेले अधिकारी नहीं हैं, जिन्हें ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ रही है। मूल सवाल प्रशासनिक मशीनरी को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त करने से जुड़ा है। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमणियम सहित अनेक पूर्व नौकरशाहों की एक याचिका पर सर्वोच्च अदालत ने नवंबर, 2013 में केंद्र और राज्य सरकारों को स्वतंत्र सिविल सर्वेंट्स बोर्ड गठित करने के निर्देश दिए थे, ताकि नौकरशाहों के तबादले, पदोन्नति, अनुशासनात्मक कार्रवाई या फिर जांच वगैरह को राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त किया जा सके। लेकिन व्यावहारिक रूप में ऐसा कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है।

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