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अब मंगल के सफर पर
नई दिल्ली
Updated Tue, 05 Nov 2013 08:02 PM IST
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बहुप्रतीक्षित मंगलयान के पृथ्वी की कक्षा में पहुंच जाने के साथ ही भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान ने उपलब्धियों का एक और आकाश छू लिया है। वैसे तो लाल ग्रह के प्रति मानवीय उत्सुकता चांद के प्रति उसकी जिज्ञासा से कम नहीं रही है, क्योंकि कई मामलों में यह पृथ्वी की तरह ही है। लेकिन यह भी सच है कि करीब पांच दशकों की खोज और भारी-भरकम खर्च के बावजूद उसके बारे में कोई ठोस और उत्साहजनक निष्कर्ष दुनिया के पास नहीं है।
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अब तक के मंगल अभियानों में से आधे से अधिक विफल रहे हैं, जिनमें चीन और जापान जैसे देशों के अभियान भी थे। फिर मंगल पर जीवन की संभावना को खारिज कर देने के नासा के निष्कर्ष के बाद वहां मानवीय अस्तित्व की संभावना के बारे में कोई सनसनीखेज जानकारी तो सामने आने से रही। ऐसे में, यह बहुत प्रासंगिक प्रश्न है कि चंद्रयान की सफलता की आत्ममुग्ध पृष्ठभूमि में आधी-अधूरी तैयारी के साथ हमारे मंगल अभियान का क्या वाकई बहुत महत्व है।
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मसलन, तीन इंजनों वाले जीएसएलवी के फिलहाल सक्रिय न होने के कारण पीएसएलवी जैसे छोटे रॉकेट से मंगलयान को प्रक्षेपित करने की हड़बड़ी पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं। तब तो और, जब यह सफर पृथ्वी से चांद की दूरी के दोगुने से भी अधिक है! अभी इस अभियान का शुरुआती चरण ही पूरा हुआ है, अब मंगल तक की यात्रा का दूसरा चरण काफी कठिन होने वाला है, जिसमें गणना में थोड़ी-सी भी हेरफेर यान को उसके लक्ष्य से दूर कर सकती है।
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इसके बावजूद इस अभियान से जुड़ी कुछ उम्मीदें अकारण नहीं हैं। अव्वल तो मंगल से जुड़ी पिछली खोजें भारत के इस अभियान में मददगार साबित होंगी। इसके अलावा हमारा मीथेन सेंसर नासा के सैटेलाइट रोवर्स की तुलना में अपनी खोज में ज्यादा सफल हो सकता है। रॉकेट भले छोटा है, लेकिन मंगलयान में लगे उपकरण ज्यादा प्रभावशाली बताए जा रहे हैं। लिहाजा मीथेन, हाइड्रोजन और खनिजों की मौजूदगी पर मंगलयान यदि कोई रोशनी न डाल पाए, तब भी इस अभियान के जरिये लाल ग्रह के बारे में समझदारी बढ़ेगी, सौरमंडल के दूसरे ग्रहों तक हमारी खोज का दायरा बढ़ेगा और सबसे बड़ी बात यह कि अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हमारी बेहतर वैश्विक छवि बनेगी।