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आखिरकार तेलंगाना
नई दिल्ली
Updated Thu, 20 Feb 2014 09:19 PM IST
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आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिलने के बाद तेलंगाना के रूप में देश को 29वां राज्य मिलना तय हो गया है। यह उस क्षेत्र के लोगों के चार दशकों के आंदोलन का नतीजा है, मगर अब कई प्रासंगिक सवाल सामने हैं।
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चूंकि तेलंगाना का मुद्दा ज्यादा भावुक और उग्र रहा है, इसलिए स्वतंत्र राज्य बन जाने के बाद अब सारी समस्याओं का समाधान हो जाना है, यह मान लेना भोलापन होगा। बल्कि कई मुद्दों पर सीमांध्र के साथ उसकी समस्याएं अब शुरू होंगी।
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कृष्णा और गोदावरी नदियों का बड़ा हिस्सा तेलंगाना से गुजरता है, पर सीमांध्र की तुलना में पानी में हिस्सेदारी इसकी कम है। कृष्णा नदी घाटी के उपजाऊ हिस्से ने जहां सीमांध्र को बड़ा धान उत्पादक बना दिया, वहीं तेलंगाना के सूखाग्रस्त इलाकों में पानी की कमी एक दुखद हकीकत है। यह अपेक्षा है कि राज्य बनने के बाद तेलंगाना को उसके हिस्से का पानी मिलेगा, लेकिन पानी के बंटवारे के मुद्दे पर पंजाब-हरियाणा और कर्नाटक-आंध्र प्रदेश के बीच का विवाद भविष्य के बारे में सचेत भी करता है।
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सिंचाई वहां एक बड़ा मसला है, और वाई एस आर रेड्डी ने इस क्षेत्र में बड़ी पहल की थी, लेकिन जमीन पर इसका असर देखने के लिए तेलंगाना को भारी निवेश करने की जरूरत पड़ेगी। हैदराबाद का सवाल भी उतना ही बड़ा है, जिस पर तेलंगाना भले अपना हक माने, लेकिन उसे विकसित करने में योगदान तो सीमांध्र का ही ज्यादा है।
समकालीन सत्ता राजनीति की विडंबना यह है कि वह तात्कालिक हानि-लाभ देखकर कदम उठाती है : कांग्रेस ने चुनावी लाभ के लिए स्वतंत्र तेलंगाना में जितनी रुचि ली, उतनी सीमांध्र को उसका हक दिलाने में शायद ही ली हो। इसी तरह भाजपा के पास इस मुद्दे पर विरोध का कोई पुख्ता तर्क बेशक नहीं था, पर अगर वह केंद्र की सत्ता में आती है, तो विदर्भ, गोरखालैंड, बोडोलैंड और पूर्वांचल की मांगों से उसे जूझना पड़ सकता है।
तेलंगाना का वही तर्क रहा है, जो झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का रहा है कि प्राकृतिक रूप से संपन्न होने के बावजूद वे गरीब हैं। पर पृथक राज्य बनने के बाद वे अपनी कोई उल्लेखनीय पहचान नहीं बना पाए। क्या उम्मीद करें कि तेलंगाना इस सोच को गलत साबित करेगा!