अच्छे नहीं आसार
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जमीन अधिग्रहण के मुद्दे पर कदम खींचने के एक दिन बाद ही मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही की विकास दर के आंकड़े मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब बनकर आए हैं। रेटिंग एजेंसी मूडी ने भी कुछ दिन पहले भारत की विकास दर गिरने का अनुमान जताया था, लेकिन खुद सरकार ने अनुमान जताया गया था कि विकास दर साढ़े सात फीसदी के आसपास रह सकती है। पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में जीडीपी की वृद्धि दर साढ़े सात फीसदी दर्ज की गई थी, जिसके बाद ही सरकार ने 2015-16 में इसके आठ फीसदी से ऊपर ही रहने का अनुमान जताया था। कहने की जरूरत नहीं कि ताजा आंकड़े सरकार के लिए चुनौती बनकर आए हैं, जिसके लिए यह अच्छी खबर नहीं है कि आधारभूत संरचना से जुड़े आठ अहम क्षेत्रों में विकास दर घटकर सिर्फ 1.1 फीसदी रह गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यभार संभालने के बाद से मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में खासा जोर दिया है, जिसमें बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने की संभावनाएं भी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसमें कुछ खास नहीं हो सका है। मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में आठ फीसदी के बजाय सिर्फ 7.2 फीसदी की विकास दर दर्ज की गई है। असल में 'मेक इन इंडिया' कार्यक्रम की जिस दमखम के साथ शुरुआत की गई थी, उसके अनुरूप इसने असर नहीं दिखाया है। इसी तरह कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र में सिर्फ 1.9 फीसदी की विकास दर देखी गई, जबकि पिछले वर्ष इस अवधि में यह 2.6 फीसदी थी।
यही नहीं, मानसून को लेकर जो अनुमान जताए गए थे, वे भी सही साबित हो रहे हैं, जिससे अनेक क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात बन रहे हैं। यानी आने वाली तिमाहियों में कृषि क्षेत्र की चुनौती बढ़ती जाएगी। संतोष की बात है कि भारत की विकास दर में वृद्धि अब भी चीन से अधिक है और कमोबेश प्याज जैसे उत्पादों की कीमतों में मौसमी उछाल के बावजूद मुद्रास्फीति नियंत्रित है। हालांकि इसके पीछे कच्चे तेल के दाम में जारी गिरावट एक बड़ा कारण है। वास्तव में सरकार को आसन्न संकट से उबरने के लिए रिजर्व बैंक के साथ पहल करनी चाहिए, ताकि ब्याज दरों में कमी की जा सके, जिससे उपभोक्ताओं के साथ ही निवेशक भी उत्साहित हो सकें।