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शिविर में भी राहत नहीं

Fri, 20 Dec 2013 07:15 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 20 Dec 2013 07:15 PM IST
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No relief in camp

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर और शामली जिलों में हुए दंगों के सौ दिन बीत जाने के बावजूद आज भी हजारों दंगा पीड़ितों को विभिन्न राहत शिविरों में रहना पड़ रहा है।

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गन्ने की खेती के लिए मशहूर इस इलाके में दंगों के दौरान जो खटास पड़ गई, उसकी वजह से लोग अब भी अपने घरों को लौटना नहीं चाहते। अपने घरों से उजड़ने की पीड़ा वाकई बहुत त्रासद होती है, तिस पर राहत शिविरों में भी उनके लिए कोई अच्छी स्थिति नहीं है।
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शिविरों में न तो ठीक से सोने का इंतजाम है और न ही ठंड से बचने का। पहले ही अनेक बच्चों के मरने की खबरें आ चुकी हैं, इसके बावजूद प्रशासनिक तौर पर कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया जा रहा है। यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि देश की राजधानी से महज सवा सौ किलोमीटर दूर लोगों को कैसी बदहाली में जिंदगी गुजारनी पड़ रही है। वहां न तो पीने के पानी की ठीक से व्यवस्था है और न ही सफाई की, जिसकी वजह से बीमारी फैलने का भी खतरा पैदा हो गया है। अधिक दिन नहीं हुए, जब सर्वोच्च अदालत ने शिविरों की बदतर स्थिति का संज्ञान लिया था।
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यह नहीं भूलना चाहिए कि इन दंगों से प्रभावित हुए अधिकांश लोग छोटे किसान, खेतिहर मजदूर या छोटा-मोटा काम करने वाले लोग थे, जिनसे उनके रोजगार का जरिया छिन गया है। असल में मुजफ्फरनगर के दंगों ने एक बार फिर साबित किया है कि सांप्रदायिक दंगे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं होते, बल्कि वे आम लोगों से सम्मानजनक तरीके से जीने का अधिकार भी छीन लेते हैं।

सूबे की अखिलेश यादव सरकार ने दंगों के बाद आनन-फानन में जिस तरह के राहत की घोषणा की थी, उसमें पीड़ितों के प्रति संवेदना कम, बल्कि सियासत अधिक थी। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने उसके इस पक्षपातपूर्ण कदम पर सवाल उठाए। बात सिर्फ उत्तर प्रदेश की नहीं है, असल में इस पर विचार करने की जरूरत है कि आखिर सरकारों की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए?


उत्तर प्रदेश को ही देखें, तो वहां अभी इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मनमाने तरीके से लाल बत्ती बांटने और मंत्री पद का दर्जा दिए जाने पर एतराज जताया है। एक तरफ तो सरकार के पास अपने लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया करने के लिए धन नहीं है, और वह केंद्र से विशेष सुविधा की मांग भी करती है; दूसरी ओर भारी-भरकम सरकारी अमला रखने से भी उसे गुरेज नहीं! यह स्थिति बदलनी चाहिए।

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