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हमले के नौ साल बाद

Fri, 11 Sep 2015 08:25 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 11 Sep 2015 08:25 PM IST
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Nine years after assault

मुंबई की जीवनरेखा मानी जाने वाली लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई, 2006 को शृंखलाबद्ध बम धमाके से जुड़े मामले में आखिरकार अदालत ने 12 आरोपियों को दोषी करार दिया है। नौ वर्ष लंबी चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले ने उस शाम की याद ताजा कर दी, जब एक के बाद एक हुए धमाकों से देश की आर्थिक राजधानी दहल गई थी।

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दहशतगर्तों ने अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए लोकल ट्रेनों को चुना था, जिसमें रोजाना सत्तर लाख मुंबईवासी सफर करते हैं, शायद इसलिए कि अधिक से अधिक नुकसान हो। यह तो मुंबईवालों का जीवट है कि वे ऐसे किसी हमले के आगे कभी झुके नहीं। इस मामले में विशेष अदालत के फैसले का अहम पक्ष यह है कि उसने 13 में से सिर्फ एक आरोपी को ही बरी किया है। इसका अर्थ यह है कि अभियोजन ने बड़ी मजबूती से अपना पक्ष रखा। लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि अब भी इस हमले का मुख्य साजिशकर्ता और लश्कर-ए-तैयबा का आतंकी अजीम चीमा और कई अनेक आतंकी गिरफ्त से बाहर हैं।
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इस फैसले ने एक बार फिर दिखाया है कि किस तरह पाकिस्तान से आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। जिन लोगों को दोषी ठहराया गया है, उन्हें लश्कर के आतंकियों ने ही प्रशिक्षण दिया था। वास्तव में मार्च, 1993 के बाद से मुंबई सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हुए आतंकी हमलों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और लश्कर जैसे संगठनों की भूमिका रही है। जाहिर है, अपने खुफिया और सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के साथ ही पाकिस्तान पर भी दबाव बनाना उतना ही जरूरी है।
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यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा के बाद वहां की सरकार ने आतंकी सरगना दाऊद इब्राहिम की संपत्तियों की जांच शुरू की है। मुश्किल यह है कि पाकिस्तान हाफिज मोहम्मद सईद से लेकर जकीउर रहमान लखवी और दाऊद इब्राहिम तक के खिलाफ सुबूत दिए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। असल में मुंबई सहित देश के विभिन्न हिस्सों में हुए आतंकी हमलों में जब तक पाकिस्तान में बैठे आतंकियों को सजा नहीं दिलाई जाती, इन हमलों के पीड़ितों को पूरा न्याय नहीं मिल सकेगा।

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