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राज्यपाल शासन से आगे
नई दिल्ली
Updated Sun, 11 Jan 2015 07:48 PM IST
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जम्मू-कश्मीर में किसी राजनीतिक पार्टी को बहुमत न मिलने और पखवाड़े भर बाद भी सरकार गठन की दिशा में सफलता न मिलने की स्थिति में फौरी तौर पर बेशक यही विकल्प था, पर सूबे के लोगों ने प्रतिकूल मौसम और आतंकवादियों की धमकियों की परवाह न कर बढ़-चढ़कर मतदान एक मजबूत सरकार के लिए किया था, राज्यपाल शासन के लिए नहीं।
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जम्मू-कश्मीर में जल्द ही सरकार गठन एक तो इसलिए जरूरी है कि सीमा पर होने के कारण यह राज्य लगातार आतंकवादी खतरों के निशाने पर है। दूसरा यह कि कुछ ही महीने पहले इस राज्य ने विनाशकारी बाढ़ का सामना किया है, और एक सरकार ही पुनर्निर्माण का काम बखूबी जारी रख सकती है। बेशक मौजूदा परिस्थिति में राज्य में गठबंधन सरकार ही बन सकती है, और उसके लिए राजनीतिक पार्टियों के बीच आपसी सहमति बेहद जरूरी है। पर लोगों की भावनाओं और राज्य की बेहतरी को भी ध्यान में रखना होगा।
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मौजूदा परिस्थिति में पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार ही सबसे बड़ी संभावना के रूप में है, तो इसकी वजह है; एक घाटी से है, दूसरी जम्मू से, लिहाजा ऐसी सरकार में प्रांत के दोनों हिस्सों की न सिर्फ उचित भागीदारी होगी, बल्कि ये दोनों अपने-अपने क्षेत्रों का बेहतर प्रतिनिधित्व भी कर सकती हैं। फिर भाजपा के कारण ऐसी सरकार के स्थिर होने की भी गारंटी होगी। दोनों के बीच बातचीत फिलहाल शर्तों और महत्वाकांक्षाओं के बोझ से भले ही टूटी है, पर आकलन यही है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा नए सिरे से राज्य में सरकार गठन के लिए सक्रिय होने वाली है।
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लेकिन वह सक्रियता अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए नहीं, राज्य की बेहतरी को ध्यान में रखकर होनी चाहिए। इसके लिए अगर जरूरत पड़े, तो राजनीतिक पार्टियों को अपने रवैये में नरमी बरतनी पड़ेगी और महत्वाकांक्षाओं का त्याग भी करना पड़ेगा। भाजपा को यह समझना होगा कि तमाम प्रयासों के बावजूद वह घाटी में नहीं पहुंच पाई है। इसी तरह पीडीपी इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि भाजपा अपने दमखम पर सूबे की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी है। सबसे बड़ी बात यह कि इस बार मतदान के दौरान लोगों ने जिस बदलाव की आकांक्षा का परिचय दिया है, उसे देखते हुए सरकार गठन से पीछे हटकर राजनीतिक पार्टियां गलत संदेश दे रही होंगी।