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माकपा का नया नेता
नई दिल्ली
Updated Mon, 20 Apr 2015 08:05 PM IST
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मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नए महासचिव सीताराम येचुरी ने ऐसे समय में पार्टी की कमान संभाली है, जब वह अपने अस्तित्व को लेकर संघर्ष कर रही है। हालांकि केरल के बुजुर्ग नेता एस रामचंद्र पिल्लई ने भी दावेदारी जताई थी, लेकिन पार्टी ने अंततः अपेक्षाकृत युवा और उदार माने जाने वाले येचुरी को सर्वसम्मति से महासचिव चुना। येचुरी को विरासत में एक ऐसी पार्टी मिल रही है, जिसका जनाधार लगातार सिकुड़ता जा रहा है और लोकसभा में उसकी संख्या दहाई तक में नहीं है!
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यही नहीं, ले देकर उसके पास त्रिपुरा के रूप में एक छोटा-सा टापू ही बचा है। बेशक, केरल में यूडीएफ के मुकाबले एलडीएफ अब भी प्रमुख विपक्षी गठबंधन है, लेकिन वहां भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले लोकसभा चुनाव के समय से ही निरंतर प्रयासरत हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल में पिछली पराजय के बाद से माकपा कार्यकर्ताओं के हौसले पस्त हो गए हैं और हालत यह हो गई है कि वहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच होड़ मची हुई है।
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असल में येचुरी की सबसे तात्कालिक चुनौती यही है कि अगले वर्ष इन दोनों राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए वह पार्टी और वाम मोर्चे को किस तरह तैयार करते हैं। हालांकि इसके साथ ही उन्हें उस बड़े सवाल से भी जूझना है, जो वामपंथी राजनीति को लगातार मथ रहा है कि आखिर वह उत्तर उदारीकरण के बाद की राजनीति में खुद को कैसे प्रासंगिक बनाए रखे।
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निरंतर सिकुड़न के बावजूद येचुरी ने माकपा और भाकपा (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के विलय के बारे में कोई स्पष्ट बात नहीं की है और इसे सैद्धांतिक लड़ाई से जोड़ते हुए उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा है कि वह अभी वाम पार्टियों की एकजुटता का प्रयास करेंगे। हालांकि उन्होंने संसद के भीतर और बाहर जनता परिवार या कांग्रेस के साथ गठजोड़ के बारे में भी कुछ नहीं कहा है।
प्रकाश करात की तरह वह भी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं, लेकिन दोनों में सबसे बड़ा फर्क यही है कि करात जहां जिद की हद तक सैद्धांतिक आग्रहों से बंधे हुए हैं, वहीं येचुरी को एक 'व्यावहारिक कम्युनिस्ट' माना जाता है। तेजी से भाजपा (एनडीए) बनाम अन्य की ओर बढ़ रही देश की सियासत में वह माकपा को कहां ले जाते हैं, यह देखना वाकई दिलचस्प होगा।