फुटबॉल का नया बादशाह
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विश्व कप फाइनल में अर्जेंटीना को हराकर जर्मनी फुटबॉल की नई ताकत बेशक अब बना है, पर इस खेल में अपने दबदबे का परिचय तो वह टूर्नांमेट की शुरुआत से ही दे रहा था। कलात्मक फुटबॉल की धरती पर जर्मन खिलाड़ियों ने आक्रामक फुटबॉल का प्रभावी प्रदर्शन किया। रोनाल्डो पर निर्भर पुर्तगाल और नेमार पर निर्भर ब्राजील को मात खानी पड़ी। जबकि दीवार की तरह अभेद्य रक्षा पंक्ति और विपक्ष के किसी भी दुर्ग को भेद देने की क्षमता रखने वाले एक से एक स्ट्राइकर के बावजूद जर्मनी किसी एक खिलाड़ी पर निर्भर नहीं था। पूरे टूनार्मेंट में जर्मनी की ओर से उसके आठ खिलाड़ियों ने अट्ठारह गोल किए और फाइनल में हुआ इकलौता गोल उसके अतिरिक्त खिलाड़ी मारियो गोट्जे ने किया! यह टीम भावना ही उसकी जीत की सबसे बड़ी वजह है।
दूसरी ओर, फाइनल में हार के बावजूद अर्जेंटीना ने पूरे विश्व कप में शानदार प्रदर्शन किया। बल्कि दक्षिण अमेरिका में जिस कलात्मक फुटबॉल की उम्मीद थी, उसे मेसी ने पूरी की। विपक्षी डिफेंडरों से घिरे होने के बावजूद मैच-दर-मैच साथियों को दिए जाने वाले दर्शनीय पास, कई खिलाड़ियों को छकाकर बाएं पैर से किए गए गोल और दबाव में होने के बावजूद उनकी शांत मुद्रा प्रभावित करती थी। यह उनका सबसे सफल विश्व कप था, इसीलिए यह उम्मीद थी कि अपने बूते अर्जेंटीना को चैंपियन बनाकर वह अपने हमवतन डियोगो मैराडोना की बराबरी कर लेंगे। पर दुर्योग से यह उम्मीद पूरी नहीं हुई।
पिछले चैंपियन स्पेन की बादशाहत कम समय के लिए रही। पर जर्मनी के लिए ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि पिछले करीब एक दशक में वहां फुटबॉल को क्लब स्तर पर लोकप्रिय बनाने और युवाओं को इससे जोड़ने के कई काम हुए हैं। वहां के फुटबॉल क्लब विदेशी धन्नासेठों के हाथ में नहीं हैं, इसीलिए उम्मीद कर सकते हैं कि जर्मन फुटबॉल का हश्र निकट भविष्य में ब्राजील और इंग्लैंड की तरह नहीं होने वाला। खुद ब्राजील के दयनीय प्रदर्शन के बाद वहां क्लब स्तर पर ढर्रा बदलने और युवा फुटबॉलरों को यूरोपीय क्लबों में जाने से रोकने के सुझाव दिए जा रहे हैं।
भारत फुटबॉल के मानचित्र में बेशक कहीं नहीं है, पर यहां फुटबॉल की जैसी लोकप्रियता है, और जो विश्व कप के दौरान दिखी भी, उसे देखते हुए फुटबॉल को खेल संस्कृति में शामिल करने के बारे में हमारे नीति-नियंताओं को क्या नहीं सोचना चाहिए!