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नेपाल में उम्मीदें

Thu, 11 Jun 2015 08:09 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 11 Jun 2015 08:09 PM IST
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new hopes from Nepal

अगर भूकंप के बाद पैदा हुए दबाव ने ही नेपाल की मुख्य राजनीतिक पार्टियों को संघीय व्यवस्था पर सहमत होने के लिए कमोबेश विवश किया है, तो भी इसका स्वागत किया जाना चाहिए। कहां तो नेपाल को तय समय में संविधान न तैयार कर पाने की शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही थी, और कहां अब शासन व्यवस्था के भावी स्वरूप, चुनावी प्रक्रिया आदि मुद्दों पर देश की उन चार राजनीतिक पार्टियों में सहमति बनती दिखाई दे रही है, जिनका संविधान सभा में बहुमत है।

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नेपाल के राजनीतिक दल, देर से ही सही, अपनी जिम्मेदारी का परिचय देते दिख रहे हैं। यह तय हुआ है कि नेपाल का संविधान लचीला होगा, संघीय व्यवस्था के तहत देश में आठ राज्य बनेंगे। जहां तक चुनाव प्रणाली की बात है, तो साठ प्रतिशत प्रतिनिधियों को जनता सीधे चुनेगी, और शेष चालीस फीसदी अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाएंगे। राजतंत्र को पूरी तरह उखाड़ फेंकने के बाद भी जो देश अभी तक लोकतांत्रिक व्यवस्था के बारे में अपनी समझ का स्पष्ट सुबूत नहीं दे पाया था, उस देश में यह घटनाक्रम उम्मीद जगाता है, इसमें संदेह नहीं।
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दरअसल राजनीतिक पार्टियों के बीच मतभेद के कारण ही संविधान का काम अभी तक बाधित था। इसके बावजूद कुछ आशंकाएं तो हैं ही। नेपाल का समाज बेहद ध्रुवीकृत है, और पहचान का मसला बड़ा मुद्दा है। ऐसे में प्रस्तावित राज्यों का नामकरण और सीमांकन उतना आसान भी नहीं है, जितना कि अभी महसूस हो रहा है। यह ठीक है कि संघीय आयोग प्रस्तावित आठ राज्यों के नाम और उनकी सीमारेखा आदि तय करेगा। लेकिन एक विभाजित समाज में यह काम भविष्य के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। फिर उस नजरिये को कैसे बदलेंगे, जो प्रस्तावित संघीय व्यवस्था को अपने-अपने हिसाब से देख रहा है?
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वामपंथियों का एक धड़ा इसे अपनी ताकत हमेशा के लिए खत्म होना मान रहा है, तो दक्षिणपंथियों का एक हिस्सा प्रस्तावित शासन व्यवस्था को माओवादी प्रस्ताव के रूप में देख रहा है, जिसमें नेपाली कांग्रेस तथा दो वाम दल नाहक ही फंस गए हैं। इसी तरह माओवादी संसदीय व्यवस्था में पूरी तरह यकीन नहीं करते, तो आरपीपीएन जैसी पार्टी धर्मनिरपेक्षता को मानती ही नहीं। इन सब विरोधाभासों से निकलकर नेपाल वांछित लोकतांत्रिक व्यवस्था तक जल्दी पहुंचे, तभी राजनीतिक पार्टियों की इस सहमति का मतलब है।

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