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नेपाल में नई उम्मीद

Tue, 28 Jan 2014 07:34 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 28 Jan 2014 07:34 PM IST
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new hope in nepal

संविधान सभा के चुनाव के दो महीने बाद नेपाल में नई सरकार के गठन की दिशा में हुई प्रगति एक ऐसी घटना है, जो भारत के लिए भी आश्वस्त करने वाली है। आगामी दो फरवरी तक वहां सुशील कोइराला के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार के शपथ लेने की उम्मीद बनी है, तो यह चुनावी नतीजे के फौरन बाद नेपाली कांग्रेस और दूसरे सबसे बड़े राजनीतिक दल सीपीएन-यूएमएल के बीच हुए तालमेल का ही नतीजा है।

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असल में, वहां सबसे बड़ी जरूरत फिलहाल स्थिरता की है। वर्ष 2008 के बाद नेपाल में पांच बार सरकारें बदली हैं और राजशाही के खात्मे के वर्षों बाद भी देश अंतरिम संविधान के जरिये चल रहा है। इस अस्थिरता के कारण अर्थव्यवस्था चरमरा गई है, बाहरी देशों का कारोबार वहां लगभग सिमट गया है और रोजगार के लिए लोगों का देश से बाहर जाना निरंतर जारी है।
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नई सरकार के गठन में दोनों बड़ी पार्टियों के बीच सरसरी तौर पर कोई मतभेद फिलहाल नहीं दिखाई देता। जहां तक नेपाली कांग्रेस का मामला है, तो वह राष्ट्रीय सर्वानुमति की सरकार बनाना चाहती है, जिसमें माओवादियों को साथ लेने में भी वह नहीं हिचकेगी। उसने अगले एक साल में नया संविधान तैयार कर लेने की प्रतिबद्धता भी जताई है। लेकिन सरकार में शामिल होने का संकेत देते हुए सीपीएन-यूएमएल ने मंत्रालयों का जिस तरह जिक्र किया है, उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। वह सिर्फ राष्ट्रीय सर्वानुमति के नाम पर इस सरकार में शामिल होगी, यह मानना थोड़ा मुश्किल है।
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राजशाही की समाप्ति एक ऐतिहासिक घटना जरूर है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि नेपाल की मौजूदा स्थिति के लिए राजनीतिक पार्टियां ही ज्यादा जिम्मेदार हैं। राजशाही के दौरान शासन चलाते हुए इन दलों ने भ्रष्टाचार और अवसरवाद का जो नमूना पेश किया था, और जिसके कारण नेपाल लगातार अस्थिर और कमजोर होता चला गया, वह राजतंत्र के खात्मे के बाद भी अनवरत जारी है।


इन पिटे हुए मोहरों की जगह मतदाताओं ने जिन माओवादियों को पहले सत्ता सौंपी थी, वे भी अपने अति क्रांतिकारी और भारत-विरोधी रुख के कारण अप्रासंगिक हो गए हैं। ऐसे में, नई गठबंधन सरकार के प्रति भरोसा जताते हुए भी इसकी स्थिरता पर सवाल तो बना ही रहेगा।

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