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जम्मू-कश्मीर में नई सुबह
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 01 Mar 2015 07:36 PM IST
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मुफ्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में नई सरकार के गठन से जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ समय से जारी गतिरोध तो टूटा ही है, उससे भी महत्वपूर्ण यह कि इस राज्य में सरकार का हिस्सा बनना खुद भारतीय जनता पार्टी के लिए ऐतिहासिक अवसर है।
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जनसंघ के प्रतीक पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आंदोलन करते हुए जहां अपने प्राण त्यागे थे, आज उसी सूबे में सरकार चलाने की साझा जिम्मेदारी भाजपा को मिली है! विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद पीडीपी और भाजपा को गठबंधन सरकार चलाने के लिए सबसे आदर्श बताया जा रहा था, तो केवल इसलिए नहीं कि सीटों के लिहाज से वे पहले और दूसरे नंबर की पार्टियां थीं, जिस कारण सरकार के स्थायी होने की गारंटी सर्वाधिक है, बल्कि सबसे ज्यादा इसलिए कि चूंकि एक पार्टी कश्मीर का, और दूसरी पार्टी जम्मू का प्रतिनिधित्व करती है। ऐसे में, सूबे के दोनों हिस्सों की संतुलित हिस्सेदारी की भी गारंटी है।
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जम्मू-कश्मीर दरअसल जिन चुनौतियों से दो-चार है, उन्हें देखते हुए एक स्थिर सरकार की आवश्यकता है। भीषण बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण कार्य के लिए राज्य को आर्थिक मदद की जरूरत है, जो केंद्र के सहयोग के बगैर संभव नहीं। सीमांत राज्य होने और पाक प्रायोजित आतंकवाद के निशाने पर रहने के कारण सुरक्षा और स्थिरता तो इसकी बहुत बड़ी चुनौती है। इसी तरह जम्मू-कश्मीर को कर्ज और बेरोजगारी से बाहर निकालते हुए विकास की मुख्यधारा में लाने का काम भी करना है। यह काम, जाहिर है, दोनों पार्टियों के बीच आपसी तालमेल और समझ-बूझ से ही हो सकता है।
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लेकिन शपथ ग्रहण के बाद संवाददाता सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने राज्य में चुनाव के लिए हुर्रियत, पाकिस्तान और आतंकियों को जिस तरह श्रेय दिया, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। उनकी यह टिप्पणी सिर्फ गठबंधन सहयोगी भाजपा के लिए ही परेशान करने वाली नहीं है, सूबे के मतदाताओं के हौसले को भी कमतर करके आंकती है। यह इसका भी संकेत है कि दो विपरीत वैचारिकताओं वाली पार्टी के लिए मिल-जुलकर सरकार चलाना आगे आसान नहीं भी हो सकता है। यह खुद मुफ्ती के लिए भी ऐतिहासिक अवसर है कि मतदाताओं ने जो जिम्मेदारी उन्हें सौंपी है, उस पर वह खरा उतरें। सुशासन के साथ-साथ उनसे सतर्कता की भी अपेक्षा है।