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जाफना में नई सुबह

Mon, 23 Sep 2013 08:06 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 23 Sep 2013 08:06 PM IST
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New dawn in jafna

पच्चीस वर्ष से भी लंबे समय तक चले गृहयुद्ध में तबाह हो चुके श्रीलंका के उत्तरी प्रांत में हुए चुनावों को शुभ संकेत माना जा सकता है; वरना चार वर्ष पूर्व भीषण सैन्य कार्रवाई में तमिल विद्रोहियों (लिट्टे) के सफाए के पहले तक यह क्षेत्र दुनिया के सबसे अशांत क्षेत्रों में से था।

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तमिल बहुल इस क्षेत्र में प्रांतीय परिषद के लिए हुए चुनावों में अपेक्षा के अनुरूप ही पांच दलों के गठबंधन तमिल नेशनल एलायंस (टीएनए) ने जाफना सहित क्षेत्र के पांचों जिलों में भारी जीत हासिल की है। मगर जिस तरह से इस गठबंधन को 80 फीसदी के करीब वोट मिले हैं, उसके राजनीतिक निहितार्थ भी बहुत गहरे हैं।
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इन नतीजों का साफ मतलब है कि श्रीलंका की महिंद्रा राजपक्षे सरकार और वहां की सेना ने बेशक तमिल विद्रोहियों का सफाया कर दिया हो, लेकिन स्वशासन और समान नागरिकता जैसे तमिलों के मुद्दे वहां अब भी अहम हैं। तमिल विद्रोहियों के गढ़ रहे इस क्षेत्र में प्रांतीय परिषद के लिए हुआ यह पहला चुनाव वाकई बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके जरिये श्रीलंका के अल्पसंख्यक तमिलों ने दिखाया है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से अपना अधिकार पाना चाहते हैं। सच तो यह है कि यह राजपक्षे सरकार के लिए भी एक अवसर है कि वह दो कदम आगे बढ़कर तमिलों का हाथ थामे और राजनीतिक सत्ता में उन्हें भी भागीदार बनाए।
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असल में, अक्षुण्ण और संप्रभु श्रीलंका के भीतर ही तमिलों के अधिकार सुरक्षित रखना राजपक्षे की जिम्मेदारी भी है और चुनौती भी! यह नहीं भूलना चाहिए कि गृहयुद्ध का वह दौर श्रीलंका का काला इतिहास है, जिसने आत्मघाती हमलों के जरिये दुनिया को आतंक के एक नए अध्याय से परिचित कराया था। राजपक्षे की सरकार और श्रीलंकाई सेना पर युद्ध के दौरान तमिलों के मानवाधिकारों के हनन के गंभीर आरोप भी लगे थे, जिसकी वजह से उन्हें अंतरराष्ट्रीय आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी थीं।


और अब टीएनए के विजयी होने से युद्ध अपराधों की निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ सकती है। हालांकि इस चुनाव के जरिये राजपक्षे ने काफी हद तक अपने दाग धो लिए हैं, पर यदि उन्होंने तमिलों के साथ सौतेला व्यवहार जारी रखा, तो वह उनके लिए ही अहितकर होगा। बहरहाल, जाफना में नई सुबह का स्वागत किया जाना चाहिए।

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