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नेताजी आज किसके साथ खड़े होते?
सुदीप ठाकुर/नई दिल्ली
Updated Sat, 30 Jan 2016 07:39 PM IST
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस से संबंधित दस्तावेजों को उनके जन्मदिन 23 जनवरी को सार्वजनिक करने के बाद अब तक दो ही ऐसी जानकारियां सामने आई हैं, जिनसे कदाचित हम सब वाकिफ नहीं थे। पहली है नरसिंह राव सरकार द्वारा 18 अगस्त, 1945 को हवाई हादसे में नेताजी की मौत की स्वीकारोक्ति और दूसरी है नेहरू सरकार द्वारा नेताजी की पत्नी और बेटी को की गई आर्थिक मदद की पेशकश।
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नेताजी से संबंधित ये दस्तावेज अब राष्ट्रीय अभिलेखागार का हिस्सा हैं और इससे संबंधित और फाइलें सार्वजनिक की जानी हैं, लिहाजा यह कौतुहल बना रहेगा कि क्या इसमें कोई ऐसी बात छिपी है, जो नेताजी के जीवन से जुड़ा कोई नया पहलू उजागर कर सके!
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पर क्या उनसे संबंधित फाइलों को सार्वजनिक किए जाने भर से इस महान राष्ट्रीय नेता के साथ न्याय हो पाएगा? इन फाइलों के सार्वजनिक करने का औचित्य क्या सिर्फ यही बताना है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस पार्टी ने उनके साथ न्याय नहीं किया?
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जैसा कि हम सब जानते हैं कि नेताजी का कुल जीवन 48 वर्ष का था। यदि वह उस हवाई हादसे के बाद भी जीवित थे, तो उसके बारे में अब तक सामने आए दस्तावेज किसी तरह का कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। ऐसे में यह हैरानी की बात है कि नेताजी ने अपने ज्ञात जीवनकाल में जो कुछ किया उसका विवेचन करने के बजाए हम यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या उन्हें स्टालिन ने साइबेरिया में बंदी तो नहीं बना रखा था! या फिर यह कि जिस व्यक्ति के दिलो दिमाग पर भारत को लेकर वृहत सपना था, जो गांधी और नेहरू जैसे दिग्गजों से इतर अपने दम पर ब्रिटिश सम्राज्य से अकेले लड़ने का माद्दा रखता था, वह दशकों तक फैजाबाद में एक बाबा के वेश में गुमनाम तो नहीं रहा?
वास्तव में नेताजी के जीवन का मूल्यांकन करें तो पता चलता है कि 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने और महात्मा गांधी के कहने पर यह पद छोड़ने तक वे उसी राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा थे जिससे गांधी, नेहरू और सरदार पटेल सहित तमाम राष्ट्रीय नेता शामिल थे। वह युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ ही कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव पद पर भी रह चुके थे, जिससे कांग्रेस के भीतर उनकी हैसियत का पता चलता है। 1939 के बाद से उनके जीवन का दूसरा हिस्सा शुरू होता है, जिसकी अवधि उनकी मौत तक सिर्फ छह वर्ष ही थी। क्या उनके इन छह वर्षों का अलग से मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए? वास्तव में इन छह वर्षों के दौरान ही नेताजी का व्यक्तित्व अपने विराट रूप में सामने आता है, जिसमें वह ब्रिटिश साम्राज्य से अपने स्तर पर अकेले ही लड़ते दिखाई देते हैं। ये छह वर्ष उनके निजी और सार्वजनिक दोनों ही जीवन के लिए सबसे अहम थे।
मगर इन छह वर्षों के दौरान ही वैश्विक घटनाक्रम भी बहुत तेजी से चले, लिहाजा हमें उनके परिप्रेक्ष्य में ही नेताजी को भी देखना चाहिए। यह एकदम स्पष्ट था कि नेताजी का मकसद सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य से भारत को आजाद कराना था। यही मकसद तो गांधी, नेहरू और सरदार पटेल जैसे नेताओं का भी था। तो फर्क क्या था?
जो जानकारियां उपलब्ध हैं, उनके मुताबिक नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक्सिस पावर (धुरी राष्ट्र) यानी जर्मनी, इटली और जापान की मदद से भारत को आजाद कराना चाहते थे। इस सिलसिले में अप्रैल 1941 को नेताजी जर्मनी गए और इसके एक वर्ष बाद यानी मई, 1942 में ही हिटलर से उनकी मुलाकात हो सकी थी। वह निर्वासित सरकार और अपनी आर्मी बनाकर एक्सिस पावर की मदद से औपनिवेशिक भारत पर पश्चिम की ओर से आगे बढ़ते हुए ब्रिटिश शासन से मुक्त कराना चाहते थे। वह तकरीबन दो वर्ष जर्मनी में रहे जरूर लेकिन वह जिस तरह के समर्थन की अपेक्षा कर रहे थे, वैसा उन्हें वहां मिला नहीं। 1942 से 1945 के दौरान के तीन वर्ष न केवल वैश्विक घटनाक्रम के लिहाज से, बल्कि नेताजी और भारत के लिहाज से भी बेहद अहम साबित हुए थे। इसी दौरान तेजी से एक्सिस पावर की ताकत कमजोर होती चली गई।
नेताजी के बारे में अंतिम सूचना 18 अगस्त 1945 को मिली थी, जिसके मुताबिक हवाई हादसे में उनकी मौत हो गई। इससे पहले के दो घटनाक्रम पर जरा गौर कीजिए। पहली घटना है, 30 अप्रैल, 1945 की है, जब हिटलर के अपनी मंगेतर के साथ खुदकुशी करने की जानकारी मिलती है। दूसरी घटना जुलाई 26, 1945 की है जब पोट्सडम में एलाइड फोर्स (मित्र राष्ट्र) की ऐतिहासिक बैठक हुई जिसमें जापान को समर्पण करने के लिए अल्टीमेटम दिया ( यह सब इतिहास का हिस्सा है कि किस तरह जापान ने 7 दिसंबर, 1941 को हवाई में अमेरिकी युद्ध पोत पर्ल हार्बर पर भीषण हमला किया था, और फिर उसके बाद किस तरह अमेरिका ने अपने सहयोगियों के साथ जापान पर बमबारी कर उसे लगभग तबाह कर दिया)। जापान ने इसे ठुकरा दिया, जिसके फलस्वरूप अमेरिका ने छह अगस्त को हिरोसिमा और नौ अगस्त को नागासाकी नामक जापानी शहरों में परमाणु बम गिरा दिए। इन दोनों शहरों में डेढ़ लाख से अधिक लोगों की मौत हो गई और आखिरकार 15 अगस्त की दोपहर जापान के साम्राज्ञ हिरोहितो ने अपने लोगों से समर्पण के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए कहा।
नेताजी के परिदृश्य से हटने के पहले ही दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति और एक्सिस पावर के बिखरने की पटकथा तैयार हो चुकी थी। आज इस घटना के सत्तर वर्ष बाद हम बदली हुई दुनिया में देखते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के समय के शत्रु देश आज एक पाले में हैं। लाख टके का सवाल है कि नेताजी को आज विकल्प चुनना होता तो वह किसके साथ होते? जाहिर है, आज के सबसे चुनौतीपूर्ण मुद्दे आतंकवाद के खिलाफ मानवता के पक्ष में वह खड़े होते। वह सांप्रदायिकता के विरुद्ध खड़े होते। वह गरीबों और वंचितों के पक्ष में खड़े होते।
नेताजी के साथ अपनी विरासत को जोड़ने वाली दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और भाजपा में से वह किसे चुनते? निश्चित ही वह इन दोनों को नहीं चुनते। इसकी वजह साफ है। कांग्रेस से तो वह पहले ही नाता तोड़ चुके थे और जो लोग नेताजी की राष्ट्रीय सोच से इत्तफाक रखते हैं, उन्हें तो यह पता ही होगा कि वह संकीर्ण विचारधारा के नहीं थे। आजाद हिंद फौज में सिर्फ हिंदू ही नहीं थे, बल्कि सिख, ईसाई और मुस्लिमों की भी बराबर की हिस्सेदारी थी। उनका जीवन पारदर्शी था और उसमें पाखंड की कोई जगह नहीं थी। नेताजी ने एक आस्ट्रियाई महिला एमिली से प्रेम किया था और विवाह भी, जिससे उनकी एक बेटी अनिता भी हुई। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर कथित लव जेहाद का ढिंढोरा पिटने वाले क्या यह बात आज पचा पाएंगे? लिहाजा, लगता नहीं कि वह भाजपा या आरएसएस की विचारधारा का समर्थन कर पाते। इसी आधार पर आप कह सकते हैं कि नेताजी ममता बनर्जी की तृणमूल को भी नापसंद ही करते।
मुश्किल यह है कि आज भी कुछ लोग नेताजी को आज के जर्मनी के साथ नहीं, जिसने सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के आतंक की वजह से उत्पन्न हुए शरणार्थी संकट में सबसे अहम भूमिका निभाई है, बल्कि हिटलर के जर्मनी के साथ ही जुड़ा हुआ देखना चाहते हैं!