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हमारे समय में नेताजी
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
Updated Fri, 16 Oct 2015 12:43 AM IST
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिजनों से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अब उनसे जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने की घोषणा की है।
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इससे पूर्व पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक कर ही चुकी है। वर्ष 1945 में ताइपेई में हुए विमान हादसे में उनकी मौत की खबर आने के बाद से नेताजी के जीवन को लेकर विगत सत्तर वर्षों से एक तरह का रहस्य बना रहा है और तरह-तरह के दावे किए जाते रहे हैं।
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अपनी अनुपस्थिति के बावजूद सुभाष चंद्र बोस भारत के समकालीन इतिहास के ऐसे नायक हैं, जिनके बारे में कदाचित सर्वाधिक चर्चा हुई है। ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद उनकी विरासत के साथ न्याय नहीं किया गया।
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उनकी मौत का रहस्य जानने के लिए आयोग भी बने, लेकिन कहीं कुछ स्पष्ट तस्वीर उभरकर कभी सामने नहीं आई। हालांकि जो दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने हैं, वह उस समय के इतिहास पर कितनी रोशनी डाल पाएंगे, कहा नहीं जा सकता।
मसलन, पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार द्वारा सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसियां ये मानती थीं कि नेताजी न केवल 1949 तक जीवित थे, बल्कि उस वक्त दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में कम्युनिस्ट विद्रोह में उनकी भूमिका थी! ऐसे दावे भी सामने आए हैं, जिनसे पता चलता है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय से नेताजी के परिवार की खुफिया निगरानी की जाती थी।
इतिहास के ऐसे दस्तावेजों के साथ हमेशा यह खतरा भी होता है कि इनकी हर कोई अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करता है। इसके बावजूद एक लोकतांत्रिक देश में अपने एक नायक से जुड़े दस्तावेजों को बरसों तक तहखाने में बंद रखने का क्या तुक? इसके साथ ही एक सवाल यह भी है कि कहीं इन्हें अभी सार्वजनिक किए जाने के पीछे अगले वर्ष पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव तो नहीं हैं?
राष्ट्रीय नेताओं को तात्कालिक राजनीति से परे रखा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा नहीं करने से उनकी छवि पर भी असर पड़ता है। यह याद रखना चाहिए कि नेताजी एक महान राष्ट्रीय नायक थे और आज भी युवा उन्हें अपने आदर्श के तौर पर देखते हैं।