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नजरिया बदलने की जरूरत

Wed, 04 Mar 2015 08:10 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 04 Mar 2015 08:10 PM IST
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Need to change attitudes

सोलह दिसंबर, 2012 की रात दिल्ली में गैंगरेप को अंजाम देने वाले दरिदों में से एक के इंटरव्यू के कुछ अंश सार्वजनिक होने पर संसद में हुआ हंगामा अस्वाभाविक नहीं है। इंडियाज डॉटर नाम के वृत्तचित्र के लिए बीबीसी ने जब उस शख्स का इंटरव्यू लिया था, तब सामूहिक बलात्कार और हत्या के इस मामले में अदालत का फैसला नहीं आया था। पर सर्वोच्च न्यायालय उस मामले से जुड़े सभी वयस्क आरोपियों को मौत की सजा सुना चुका है। ऐसे में इंटरव्यू में उस व्यक्ति द्वारा अपने उस घिनौने कृत्य का औचित्य ठहराना न न्यायिक गरिमा के लिए उचित होगा, न सामाजिक सोच के लिए।

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इस वृत्तचित्र के लिए बीबीसी ने कई लोगों से बातचीत की, पर उसने फांसी की सजा पाए शख्स के इंटरव्यू को जिस तरह हाइलाइट किया, वह इसे सनसनीखेज बनाकर पेश करने की उसकी मानसिकता का भी पता देता है। इसलिए, यह मामला सामने आते ही सरकार, पुलिस और अदालत को एक साथ सक्रिय होना पड़ा, तो इसे समझा जा सकता है। गृह मंत्री ने घटना की जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन देने के साथ वृत्तचित्र का प्रसारण न होने का भी भरोसा दिलाया है। पर इस मुद्दे से जुड़े कुछ और सवाल भी हैं, जो जवाब की मांग करते हैं।
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हाई प्रोफाइल जेल में बंद आरोपी का इंटरव्यू जेल प्रशासन और केंद्र सरकार की अनुमति के बगैर संभव नहीं है। वृत्तचित्र की निर्माता लेसली उड्विन का कहना है कि उसे दोनों स्तरों पर अनुमति मिली थी। हालांकि बहुत कुछ साफ होना है, पर सरसरी तौर पर लगता है कि जेल प्रशासन और पिछली यूपीए सरकार ने दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन नहीं किया। यदि किया होता, तो बीबीसी आज हत्यारे के इंटरव्यू का इतने जोर-शोर से प्रचार नहीं कर पाता।
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दूसरा सवाल हमारी सोच से जुड़ा हुआ है। उस गैंगरेप के बाद यौन अपराधों से जुड़े कानून सख्त किए गए हैं। पर औरतों के खिलाफ हिंसा में कमी नहीं आई है। अगर इतनी जघन्यतम हिंसा को अंजाम देने वालों के चेहरे पर शिकन तक नहीं है, तो इससे कहीं न कहीं इसका भी पता चलता है कि फांसी जैसी सजा भी शायद औरतों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे में, उस वृत्तचित्र का प्रसारण रोकने से भी कहीं ज्यादा जरूरी है हमारी सोच और मानसिकता को बदलना।

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