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पारदर्शी नीतियों की जरूरत
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 25 Sep 2014 08:42 PM IST
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पिछले दो दशक के दौरान आवंटित 218 कोल ब्लॉकों में से चार को छोड़ बाकी का आवंटन रद्द करने संबंधी सर्वोच्च अदालत का फैसला प्राकृतिक संसाधनों की लूट रोकने में मददगार होगा। बिना निविदा बुलाए मनमाने ढंग से कोयला खदानों का आवंटन किया गया था, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा है।
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हैरानी की बात है कि यह सिलसिला पिछली पांच सरकारों के दौरान जारी रहा और किसी ने इस नीति को बदलना जरूरी नहीं समझा। सर्वोच्च अदालत ने नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) के इन आवंटनों से सरकारी खजाने को हुए नुकसान के अनुमानों को सही ठहराया है, जिससे पता चलता है कि पिछली यूपीए सरकार के मंत्री उसकी रिपोर्ट को कितने हल्के में ले रहे थे।
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वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को 2 जी स्पेक्ट्रम के 122 लाइसेंसों को रद्द किए जाने वाले फैसले के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए, क्योंकि इन दोनों ही मामलों में खुली निविदा के बजाय 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार पर आवंटन किया गया था। कोयला खदानों का आवंटन रद्द होने से तात्कालिक रूप से बिजली संकट पैदा हो सकता है, पर सच्चाई यह भी है कि इन कैप्टिव संयंत्रों से देश में पैदा होने वाली कुल बिजली का दसवां हिस्सा ही मिलता है। इसलिए यह कहना बहुत उचित नहीं लगता कि देश में बिजली की भारी कमी हो जाएगी, क्योंकि अदालत ने उन खदानों को छह महीने की मोहलत दी है, जहां काम शुरू हो चुका है।
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यह नहीं भूलना चाहिए कि इन आवंटनों के रद्द होने से वहां काम कर रहे हजारों कर्मचारियों और श्रमिकों का भविष्य भी अधर में लटक गया है, जिनके बारे में तो कोई कुछ बोल ही नहीं रहा है। उद्योग जगत का इस फैसले से चिंतित होना स्वाभाविक है, क्योंकि कोयला खदान हासिल करने वाली बिजली और इस्पात कंपनियों के इन खदानों में लाखों करोड़ रुपये फंसे हुए हैं। खदानों का आवंटन रद्द होने से बैंकों के भी एक लाख करोड़ रुपये अटक सकते हैं। इसी आधार पर आशंकाएं जताई जा रही हैं कि निवेश और अर्थव्यवस्था के लिए जो माहौल बना है, वह इस फैसले से प्रभावित हो सकता है। ये आशंकाएं कुछ हद तक सही हो सकती हैं, पर व्यापक रूप से देखें, तो प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन की गलत नीतियों को जितनी जल्दी हो सके, बदलने की जरूरत है। यही सबके हक में है।