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सुधारों की दरकार
नई दिल्ली
Updated Wed, 09 Jul 2014 07:47 PM IST
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अपना पहला बजट पेश करने जा रही मोदी सरकार के आर्थिक सर्वे को यदि कोई संकेत माना जाए, तो वित्त मंत्री व्यापक नीतिगत बदलावों पर जोर दे सकते हैं। सरकार के लिए संतोष की बात यह है कि खराब मानसून के बावजूद विकास दर 5.4 फीसदी से 5.9 फीसदी रह सकती है, जबकि यूपीए सरकार के आखिरी दो वर्षों में यह पांच फीसदी से नीचे रही थी और उसके अलोकप्रिय होने में इसका बड़ा योगदान था।
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असल में मोदी सरकार को अर्थव्यवस्था का सिरा वहां से पकड़ना है, जहां यूपीए ने उसे छोड़ा है। निश्चय ही यूपीए सरकार के आखिरी के कुछ वर्ष नीतिगत जड़ता की भेंट चढ़ गए, मगर आखिरी के कुछ महीनों में उसने जो नकद सब्सिडी जैसे कदम उठाए थे, उसका कुछ सकारात्मक असर पड़ा है। आर्थिक सर्वे कहता है कि नकद सब्सिडी वित्तीय घाटे को कम करने में मददगार साबित हो सकती है। वित्तीय घाटे को कम करना बेहद जरूरी है, क्योंकि ऐसा नहीं हुआ तो देश की आर्थिक साख को धक्का लगेगा और उसका असर निवेश पर पड़ेगा।
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सब्सिडी के बढ़ते बोझ और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम हो चुके खाद्य सुरक्षा और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों में भी सुधार की जरूरत है। वास्तव में मोदी सरकार के सामने ऐसे सामाजिक कार्यक्रमों और अर्थव्यवस्था को गति देने वाले आर्थिक सुधारों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। जो प्रमुख सुधार आज की सबसे बड़ी जरूरत हैं, उसमें कर व्यवस्था और दूसरे दौर के श्रम सुधारों को सबसे ऊपर रखा जा सकता है।
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सर्वे ने केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को न केवल शीघ्र लागू किए जाने पर जोर दिया है, बल्कि यह भी कहा है कि सरचार्ज, लेवी और ट्रांजिशन टैक्स जैसे 'खराब करों' को जल्द से जल्द वापस लेना चाहिए। असल में करों की मौजूदा व्यवस्था लाइसेंस परमिट राज जैसी लगती हैं, जहां हर कदम पर कर देना होता है।
जहां तक दूसरे दौर के श्रम सुधारों की बात है, तो यूपीए सरकार ने इसे हर संभव टालने की कोशिश ही की। ध्यान रहे, श्रमिक संगठनों की भूमिका 1991 में लागू किए गए आर्थिक सुधारों से पहले की तुलना में आज काफी बदल गई है और उनके हाथ में पहले जैसी ताकत भी नहीं रही। वाकई आज ऐसे सुधारों की जरूरत है, जो देश की व्यापक जनसांख्यिकी को विकास के इंजन में बदल दें।