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बदलाव की जरूरत

Thu, 12 Jun 2014 07:49 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 12 Jun 2014 07:49 PM IST
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need for change

लोकसभा चुनाव में करारी हार पर मंथन करते हुए माकपा ने अपनी सर्वोच्च नीति निर्धारक समिति, पोलित ब्यूरो, और केंद्रीय कमेटी में जिस तरह के तर्क दिए हैं, और सामूहिक जिम्मेदारी की बात कहकर सांगठनिक यथास्थिति बनाए रखने का जो फैसला लिया है, वे हैरान करने वाले तो हैं ही, उनसे यह भी साफ है कि वह सच्चाई को स्वीकारने का साहस खो चुकी है।

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सोलहवें लोकसभा चुनाव के दौरान उसने राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की लहर को कमतर करके आंका, साथ ही, यह भांप पाने तक में विफल रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा उसकी जगह लेने जा रही है। लगातार गलतियों का ही नतीजा है कि 2009 के चुनाव से उसके पराभव का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह अबाध जारी है।
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ऐसा नहीं है कि वाम राजनीति का आकर्षण अब लोगों को नहीं खींच सकता। बहुत थोड़े समय में आम आदमी पार्टी ने जो सफलता हासिल की है, वह बताती है कि वैकल्पिक राजनीति की गुंजाइश खत्म नहीं हुई है। पर माकपा के साथ मुश्किल यह है कि वह जनता से, उसकी समस्याओं से कट गई है। इसीलिए आम आदमी पार्टी के उदय को भी वह न सिर्फ उदासीन होकर देखती है, बल्कि उसकी श्रेष्ठता ग्रंथि उसे आप जैसी पार्टियों से हाथ मिलाने से भी रोकती है।
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बेशक माकपा और दूसरी वाम पार्टियों के पराभव के पीछे बदलते श्रम कानूनों का भी हाथ है, पर बढ़ती महंगाई, अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई और बिजली-पानी जैसे ज्वलंत मुद्दे पर सड़कों पर उतरते हुए भी उसे नहीं देखा जाता। हैरत तो इस पर है कि लोकसभा चुनाव में पराभव की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए जब कुछ वरिष्ठ माकपा नेता पद छोड़ने की बात कर रहे थे, तब महासचिव प्रकाश करात ने सामूहिक जिम्मेदारी का तर्क देकर सबको रोक लिया। जबकि माकपा को अपनी पुरानी सोच और जमे-जमाए नेताओं से छुटकारा पाने की जरूरत तो है ही, नेतृत्व के मुद्दे पर भी उसे नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।


पार्टी से निकाले गए सोमनाथ चटर्जी जैसे दिग्गजों ने भी बदतर प्रदर्शन के बाद नेतृत्व में बदलाव की बात कही है। जब पश्चिम बंगाल में अपने सर्वश्रेष्ठ चुनावी प्रदर्शन के बावजूद तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी अपने कुछ पार्टीजनों को दंडित कर सकती हैं, तब शर्मनाक हार के बावजूद यथास्थिति बनाए रखकर माकपा आखिर क्या संदेश दे रही है?

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