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नजफगढ़ का नवाब
नई दिल्ली
Updated Tue, 20 Oct 2015 07:39 PM IST
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अपने सैंतीसवें जन्मदिन के मौके पर भारतीय क्रिकेट के दिग्गज वीरेंद्र सहवाग ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी फॉर्मेट और इंडियन प्रीमियर लीग से संन्यास लेने की जिस तरह से घोषणा की, उसमें इस मस्तमौला क्रिकेटर के दर्शन को समझा सकता है। दरअसल अपने करीब डेढ़ दशक के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर में सहवाग ने कभी नफे-नुकसान की परवाह की ही नहीं। उनके लिए बल्ले पर आने वाली हर गेंद एक जैसी थी। क्रिकेट में ऐसा सम भाव बहुत कम देखने को मिलता है।
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भारतीय क्रिकेट के परिदृश्य में सहवाग के आने से पहले तक कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था, नब्बे या पंचानवे रन पर खड़ा बल्लेबाज गेंद को हवा में उछालकर बाउंड्री लाइन के पार भी कर सकता है! मुल्तान के इस सुल्तान ने यह कारनामा उस वक्त भी किया था, जब 2004 में पाकिस्तान के खिलाफ खेलते हुए 295 पर पहुंचकर उन्होंने अपना तिहरा शतक पूरा करने के लिए सकलेन मुश्ताक की गेंद पर छक्का जड़ दिया था। 104 टेस्टों में 49.34 के औसत से बनाए गए 8586 रन, और 251 एकदिवसीय मैचों में 35.05 के औसत से बनाए गए 8273 रन सहवाग की शानदार कहानी बताने के लिए पर्याप्त हैं।
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उनके खाते में दो तिहरे शतक तो हैं ही, और ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय हैं, उनका नाम एकदिवसीय मैच में सबसे तेज शतक बनाने वाले भारतीय बल्लेबाज के रूप में भी दर्ज है। सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण जैसे दिग्गजों के बीच सहवाग ने अपनी मौलिक शैली के साथ जगह बनाई। वास्तव में सहवाग ने टेस्ट मैच में रनों की रफ्तार को बदलकर रख दिया। उनकी खूबी यह भी थी कि वह किसी विवाद में नहीं पड़े। अलबत्ता फिटनेस को लेकर उन पर उंगलियां उठीं, जिसका असर उनके फॉर्म पर भी पड़ा। संन्यास के पीछे संभव है कि यह भी बड़ी वजह हो कि 2013 से भारतीय टीम में वह वापसी नहीं कर सके थे।
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पर कभी न कभी ऐसा हर खिलाड़ी के साथ होता है, असल बात यह है कि भारत की क्रिकेट की कहानी सहवाग के बिना पूरी नहीं होगी। नजफगढ़ के इस नवाब की कामयाबी की कहानी उन युवाओं को भी हमेशा प्रेरित करती रहेगी, जो अपनी तंग परिस्थितियों के बावजूद भारत की कामयाबी की कहानी लिखना चाहते हैं।