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किए की सजा

Tue, 08 Oct 2013 08:44 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 08 Oct 2013 08:44 PM IST
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Naina shahni murder punishment

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद उस नैना साहनी हत्याकांड पर विराम लग जाना चाहिए, जिसने अठारह साल पहले राजधानी दिल्ली में सनसनी फैला दी थी। उस वक्त दिल्ली युवा कांग्रेस के एक प्रभावशाली नेता सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी की हत्या कर उसकी लाश तंदूर में जलाने की कोशिश की थी, पर पुलिस की सक्रियता से तंदूर से न सिर्फ अधजला शव बरामद हुआ था, बल्कि हत्या के सूत्र भी निकल आए थे। इस मामले में सुशील शर्मा की फांसी को उम्रकैद में बदलकर शीर्ष अदालत ने न्याय की उस भावना को ही चरितार्थ किया है, जो तथ्यों और सुबूतों को तरजीह देती है।

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उसने पाया कि सुशील शर्मा का आपराधिक इतिहास नहीं रहा है, उनके खिलाफ परिवार के किसी व्यक्ति ने गवाही नहीं दी, और पत्नी की हत्या के जुर्म में वह पिछले अठारह साल से जेल में हैं। इसीलिए निचली अदालतों की सजा पलटते हुए अपने फैसले में उसने फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया है, जिसे घटाया भी जा सकता है। जिस देश में बड़े लोगों द्वारा कानून के साथ आंख-मिचौली खेलने के कई उदाहरण सामने आए हैं, वहां यह संतोष कम नहीं है कि एक प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व को उसके जुर्म की सजा जेल की सलाखों के पीछे निरंतर काटनी पड़ रही है।
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जाहिर है, यह कोई सामान्य मामला नहीं था। नैना साहनी घूंघट में रहने वाली आम औरत नहीं, बल्कि एक पढ़ी-लिखी कांग्रेस कार्यकर्ता थी। इसके बावजूद राजधानी के एक आधुनिकतम इलाके में महज अवैध संबंध के शक में उसकी हत्या कर दी गई! सुबूत मिटाने के लिए लाश को जिस तरह तंदूर में डाला गया, वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला ही नहीं, अमानवीयता का भी चरम था। उस घटना को सिर्फ इसलिए विस्मृत नहीं किया जा सकता कि उसे घटे करीब दो दशक हो चुके हैं। तब तो और भी नहीं, जब राजधानी में औरतों के प्रति अमानवीयता उस घटना के इतने वर्षों बाद भी कम नहीं हुई है।
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उस घटना के बाद राजधानी में लगातार ऐसे कई लोमहर्षक मामले आए हैं, जो िस्त्रयों की सुरक्षा पर ही सवाल नहीं खड़े करते, बल्कि कानून-व्यवस्था को भी िनशाने पर लेते हैं। ऐसे में, नैना साहनी हत्याकांड पर आए इस निर्णायक फैसले को एक मिसाल की तरह देखना चाहिए।

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