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भारी पड़ेगी चूक

Sun, 03 Nov 2013 03:03 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Sun, 03 Nov 2013 03:03 PM IST
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muzaffarnagar communal violence

अभी मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा की आग पूरी तरह ठंडी भी नहीं हुई है कि फिर से चिंगारी के सुलगने के खतरनाक संकेत मिल रहे हैं।

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इसकी शुरुआत छिटपुट हमलों, लूटपाट और फसलों में आग लगा देने से हुई, लेकिन तीन युवाओं की हत्या के बाद स्थिति ज्यादा बिगड़ गई।

जिन परिस्थितियों में ये हत्याएं हुईं, वे फिलहाल बहुत स्पष्ट भले न हों, लेकिन यह शीशे की तरह साफ है कि इलाके में सांप्रदायिक तनाव बनाए रखने की फिर से साजिश की जा रही है।

इन हत्याओं पर एक पक्ष ने जहां हर्जाना और न्याय की मांग की है, वहीं दूसरा पक्ष पुलिस-प्रशासन की एकतरफा कार्रवाई पर क्षुब्ध है। पंचायतों का दौर फिर से शुरू हो चुका है।
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पिछली बार इस तरह के जमावड़े के दौरान ही स्थिति बिगड़ी थी। चूंकि उस बार प्रशासन की शुरुआती चूक के कारण ही हालात बेकाबू हुए थे।

ऐसे में, कोशिश होनी चाहिए कि इस बार यह गलती न दोहराई जाए। लेकिन दुर्योग से इस बार भी पुलिस-प्रशासन का अब तक का रवैया संतोषजनक नहीं।

अभी जब दंगा प्रभावितों का पुनर्वास नहीं हो पाया है, तब मुजफ्फरनगर के ग्रामीण इलाकों में नए सिरे से हिंसा का भड़कना बहुत खतरनाक है।

तब तो और भी, जब आगामी लोकसभा चुनाव से पहले राज्य को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने की सुनियोजित कोशिशें बहुत पहले से चल रही हैं।

मुजफ्फरनगर में जो दो समुदाय इस समय आमने-सामने हैं, वे दशकों से भाईचारा निभाते आए हैं। इस भाईचारे की बुनियाद भारतीय किसान यूनियन जैसे संगठनों और चौधरी चरण सिंह जैसे राजनेताओं ने रखी थी।
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ऐसे में, यह आश्चर्यजनक ही है कि चरण सिंह की राजनीति का अनुसरण करने वाले मुलायम सिंह यादव की पार्टी की सरकार सांप्रदायिक हिंसा पर अंकुश लगाने में कामयाब नहीं हो पा रही।

उलटे मुजफ्फरनगर में हिंसा प्रभावित एक समुदाय प्रशासन पर एकपक्षीय कार्रवाई करने का जैसा आरोप लगा रहा है, उससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की आशंका पुख्ता ही होगी। अब भी देर नहीं हुई है।


लोगों की शिकायतों पर संवेदना का परिचय देकर और हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाकर सरकार मुजफ्फरनगर को दोबारा सांप्रदायिक हिंसा की आग में जलने से बचा सकती है।

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