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मल्टी ब्रांड मुलायम और माया

Wed, 05 Dec 2012 11:08 PM IST
Updated Wed, 05 Dec 2012 11:08 PM IST
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multi brand mulayam and Maya

मल्टी ब्रांड खुदरा में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के खिलाफ लोकसभा में विपक्ष का प्रस्ताव गिरना अप्रत्याशित नहीं है, मगर इसे सरकार की नीतियों की जीत कहना पूरी तरह सही नहीं होगा। वास्तव में एफडीआई पर चली बहस में आर्थिक नीतियों से अधिक राजनीतिक मजबूरियां झलक रही थीं। विपक्षी दलों ने ही नहीं, परोक्ष रूप से सरकार का साथ देने वाली सपा और बसपा ने खुदरा क्षेत्र में एफडीआई की मुखालफत की थी।

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मुलायम सिंह यादव एक ओर तो कहते हैं कि खुदरा में एफडीआई के आने से करोड़ों किसानों और छोटे तथा फुटकर व्यापारियों का रोजगार छिन जाएगा, मगर जब प्रस्ताव पर मतदान की बारी आती है, तो वह सदन से बाहर चले जाते हैं। मायावती की पार्टी ने तो इस प्रस्ताव को धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता से ही जोड़ दिया।
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अगर वाकई ऐसा है, तो भाजपा के इस प्रस्ताव के पक्ष में माकपा सहित अन्य वाम दलों ने कैसे वोट दिया? बेशक, सरकार लोकसभा में जीत गई, लेकिन कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब दो दिन की बहस में नहीं मिल सका। मसलन, वाणिज्य मंत्री ने कहा है कि हर साल 65,000 करोड़ रुपये के कृषि उत्पाद रख-रखाव और उठाव के बिना बरबाद हो जाते हैं।
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क्या इसे रोकने का एकमात्र तरीका एफडीआई है? मल्टी ब्रांड रिटेल में तो पहले ही बड़ी देसी कंपनियां मैदान में हैं, उनसे न तो किसानों और छोटे व्यापारियों को लाभ हुआ और न ही गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रहे तीस करोड़ से ज्यादा लोगों को। हकीकत यह है कि दो दशक से जारी उदारीकरण की नीतियों के चलते देश में पौने तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यह सिलसिला थमा नहीं है।


भाजपा आज खुदरा में एफडीआई के खिलाफ खड़ी है, लेकिन उसकी आर्थिक नीतियां कांग्रेस से कुछ खास अलग नहीं हैं। बल्कि उसने अपने कार्यकाल में उदारीकरण की नीतियों को आगे बढ़ाने से गुरेज नहीं किया। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि यदि वह भविष्य में सरकार में आती है, तो इन नीतियों को उलट देगी। वाकई यह विडंबना ही है कि आर्थिक नीतियों से जुड़े मसले पर राजनीति हावी होती जा रही है, इसीलिए इतने बड़े मसले पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में किसी तरह की सहमति नहीं बन पाई।

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