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इस हमले का मकसद
नई दिल्ली
Updated Fri, 23 May 2014 07:41 PM IST
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अफगानिस्तान के सबसे सुरक्षित समझे जाने वाले शहर हेरात में भारतीय वाणिज्य दूतावास को निशाना बनाने की आतंकियों की मंशा वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने विफल कर मुस्तैदी का परिचय तो दिया है, इसके बावजूद ठीक इस समय हुए हमले की अनदेखी करना कठिन होगा।
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यह हमला उस समय हुआ है, जब नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान समेत सभी दक्षेस देशों के शासनाध्यक्षों को निमंत्रित किया गया है, और अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई भारत रवाना होने ही वाले हैं। साफ है कि ऐसे समय हमला करके दोस्ती और मेल-मिलाप की ताजा पहल को झटका देने की कोशिश की गई है। इस समय जहां भारत में नेतृत्व परिवर्तन हुआ है, वहीं हामिद करजई के बाद अफगानिस्तान भी नए दौर में प्रवेश करने वाला है।
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दो वजहों से अफगानिस्तान के भविष्य के प्रति चिंता बढ़ी है-एक तो नाटो सैनिकों की वतन वापसी के बाद वहां असुरक्षा का खतरा बढ़ जाएगा। इसके अलावा मध्य जून में वहां होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर में बाहरी देशों, खासकर पाकिस्तान की अवांछित सक्रियता आशंकित करती है। काबुल में भारत की बढ़ती मौजूदगी दरअसल उस तबके को लंबे अरसे से खटकती रही है, जो अफगानिस्तान को पिछड़ा मुल्क बनाए रखना चाहते हैं।
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भारत चूंकि अफगानिस्तान के मददगार देशों में प्रमुख है, ऐसे में, आतंकी तत्वों का इसके प्रति गुस्सा समझ में आता है। वाणिज्य दूतावासों पर लगातार हमले कर वे दोतरफा कारोबारी रिश्ते को ठप करना चाहते हैं। पिछले साल भी जलालाबाद स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास को निशाना बनाया गया था। गौरतलब है कि 2008 और 2009 में काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर जब भीषण आतंकी हमले हुए थे, तब नई दिल्ली के अलावा वाशिंगटन ने भी उसके पीछे पाकिस्तान का हाथ बताया था।
हालांकि ताजा हमले की पाकिस्तान ने भी आलोचना की है, जो स्वागतयोग्य तो है, पर बेहतर यही होगा कि वह अफगानिस्तान में स्थिरता और विकास के लिए काम करे। हिंसा और अस्थिरता का अपना पुराना एजेंडा जारी रखकर आतंकी तत्व अगर अफगानिस्तान समेत उसके पड़ोसी देशों को डराना चाहते हैं, तो वे उसी तरह विफल होंगे, जैसे हेरात में हुए हैं।