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नैतिकता की कसौटी

Mon, 15 Jun 2015 08:19 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 15 Jun 2015 08:19 PM IST
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Morality test

इंडियन प्रीमियर लीग के पूर्व कमिश्नर और फेमा के उल्लंघन के मामले में भारत में वांछित ललित मोदी की कथित तौर पर मदद कर आरोपों से घिरीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ मोदी सरकार और भाजपा भले खड़ी हो; लेकिन इससे सरकार और विदेश मंत्री की साख को धक्का लगा है।

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2010 में आईपीएल के टीवी प्रसारण अधिकार से उठे विवाद सहित कई तरह की गड़बड़ियों के सामने आने के बाद से ललित मोदी लंदन में रह रहे हैं। पांच सौ करोड़ रुपये से भी अधिक की गड़बड़ियों से जुड़े इन मामलों के कारण प्रवर्तन निदेशालय ने मोदी के खिलाफ ब्लू कॉर्नर नोटिस तक जारी किया हुआ है।
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मीडिया में जो दस्तावेज सामने आए हैं, वह यह कहते हैं कि विदेश मंत्री रहते स्वराज ने मोदी को अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी से मिलने के लिए ब्रिटेन से पुर्तगाल जाने में यात्रा संबंधी दस्तावेज हासिल करने में मदद की। निश्चय ही इस मामले का यह पक्ष मानवता से जुड़ा हुआ है, पर इसके साथ ही तथ्य ये भी हैं कि स्वराज के पति न केवल मोदी को कानूनी मदद देते रहे हैं, बल्कि उनकी बेटी तो दिल्ली उच्च न्यायालय में पासपोर्ट से जुड़े उनके मामले में वकीलों के दल में भी शामिल थीं! जाहिर है, यह मामला उतना सीधा और सरल नहीं है, जैसा बताया जा रहा है।
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सार्वजनिक जीवन का तकाजा है कि व्यक्तिगत संबंधों को पद के आड़े नहीं आना चाहिए। वहीं इस बात से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता कि सुषमा स्वराज उन राजनीतिकों में शामिल हैं, जिनके लंबे करियर में व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के कभी कोई आरोप नहीं लगे; इसी वजह से एक समय उन्हें प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी देखा जा रहा था।


कांग्रेस सहित विपक्ष को तो खैर मोदी सरकार को घेरने का एक मुद्दा मिल गया है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि ललित मोदी के तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं से संबंध रहे हैं। कांग्रेस भले आज हमलावर हो रही है, लेकिन उसके पास भी इस बात का कोई जवाब नहीं है कि यूपीए-दो के शासनकाल में आईपीएल के पूर्व कमिश्नर को भारत क्यों नहीं लाया जा सका था। असल सवाल तो यही है कि क्या नरेंद्र मोदी सरकार इस मामले के सामने आने के बाद ललित मोदी को भारत लाकर उनके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू करेगी?

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