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अमेठी में मोदी

Mon, 05 May 2014 07:46 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 05 May 2014 07:46 PM IST
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modi in amethi

भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की उपस्थिति से आम चुनाव में सिर्फ यही बदलाव नहीं आया है कि पहली बार चुनाव पूरी तरह से व्यक्तित्व पर केंद्रित हो गए हैं। बल्कि खुद मोदी और उनके रणनीतिकारों ने चुनावी राजनीति के कई घोषित-अघोषित लीक और नियमों को बदल दिया है। गांधी परिवार के गढ़ अमेठी में भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी के पक्ष में हुई उनकी रैली को भी उनकी इसी राजनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।

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अमूमन भारतीय राजनीति के दिग्गज एक दूसरे के क्षेत्रों में न केवल मजबूत उम्मीदवार उतारने से, बल्कि वहां सभाएं करने से बचते रहे हैं। मगर मोदी ने न केवल कांग्रेस उपाध्यक्ष के निर्वाचन क्षेत्र में रैली की, बल्कि उन्होंने सोनिया, प्रियंका और राहुल गांधी पर तीखे हमले किए।
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उस अमेठी को, जिसके प्रति सूबे की अखिलेश यादव की अगुवाई वाली सपा सरकार और उससे पहले की बसपा सुप्रीमो मायावती की सरकार अतिरिक्त उदारता बरतती रही हो, मोदी ने 'सबसे पिछड़ा जिला' बताकर एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है। यह अकारण नहीं है कि मोदी ने सिर्फ और सिर्फ गांधी परिवार को निशाना बनाया और दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव और मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ ही दिवंगत पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के प्रति अतिरिक्त उदारता बरतते हुए उन्हें गांधी परिवार का पीड़ित बताया!
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मगर सवाल है कि क्या मोदी और भाजपा नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों से सहमत हैं? और क्या यदि चुनाव के बाद वह प्रधानमंत्री बन गए, तो मनमोहन सरकार की नीतियों को पूरी तरह से बदल देंगे? असल में उनकी रैली के राजनीतिक निहितार्थ साफ हैं। ऐसा लगता है कि वह अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।


राजनीति में हमेशा चुनावी हार-जीत मायने नहीं रखती, कई बार किसी लड़ाई को निर्णायक बनाने से भी राजनीति बदल जाती है। संभवतः इसीलिए मोदी ने अमेठी में बीते चार महीने से डेरा डाले आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार कुमार विश्वास का जिक्र तक नहीं किया और वहां की लड़ाई को राहुल बनाम स्मृति बताने की कोशिश की। निश्चय ही अमेठी का दस वर्ष से प्रतिनिधित्व कर रहे राहुल को भी इस चुनौती का एहसास होगा।

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