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मोदी सरकार के इरादे
नई दिल्ली
Updated Mon, 09 Jun 2014 08:29 PM IST
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संसद के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति का अभिभाषण अमूमन औपचारिक किस्म का होता है और उसमें सरकार के कार्यक्रमों की ही झलक मिलती है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का अभिभाषण भी इससे अलग नहीं था, बल्कि यह पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण, उनके विचारों और उनके एजेंडे पर केंद्रित था।
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मोदी ने चुनाव के दौरान लोगों से अपील की थी कि वह उनसे साठ महीने का वक्त मांग रहे हैं, लोगों ने उन पर भरोसा भी किया। चूंकि लोगों ने मोदी की अगुवाई में भाजपा और एनडीए को स्पष्ट जनादेश दिया, इससे उन्हें भी एहसास होगा कि उनसे लोगों की कैसी अपेक्षाएं हैं। राष्ट्रपति ने मोदी के सूत्र वाक्य को रेखांकित किया कि वह न्यूनतम सरकार और अधिकतम सुशासन पर यकीन करते हैं। इसके लिए जरूरी है कि लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें और उनके अत्यावश्यक कार्यों के बीच सरकारी तंत्र आड़े न आए।
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वैसे देखा जाए, तो राष्ट्रपति ने अभिभाषण में मोदी सरकार के रोडमैप का खाका ही खींच दिया है, जिसमें 2022 तक सबको पक्का मकान और बिजली मुहैया कराने की प्रतिबद्धता से लेकर हर प्रदेश में आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थान, हर खेत को पानी देने जैसे वायदे हैं। पर अभी सरकार की सबसे बड़ी चिंता लगातार दो वर्ष से पांच फीसदी से नीचे जा रही आर्थिक विकास दर को पटरी पर लाने के साथ ही महंगाई को नियंत्रित करने की होगी। वास्तव में आर्थिक विकास को गति देने के लिए क्रांतिकारी कदम उठाने की जरूरत है।
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अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय देश के चारों कोनों को सड़कों से जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज योजना की तर्ज पर मोदी सरकार रेल लाइन के जरिये डायमंड चतुर्भुज बनाना चाहती है। इसके अलावा भाजपा के घोषणापत्र में किए गए वायदे के मुताबिक सौ नए शहर बसाने की भी उसकी योजना है। ये ऐसे कदम हैं, जिनके जरिये नए निवेश आ सकते हैं।
मोदी सरकार के सामने बड़ी चुनौती इन आशंकाओं को खारिज करने की भी है कि उसके शासन में अल्पसंख्यक खुद को उपेक्षित महसूस कर सकते हैं; अच्छी बात यह है कि खुद राष्ट्रपति ने कहा है कि देश की प्रगति में अल्पसंख्यकों की बराबर की भागीदारी होगी। बेशक, यह अभी शुरुआत है, पर इन कदमों के साथ ही मोदी सरकार की राज्यों की स्वायत्तता को पुनर्स्थापित करने की घोषणा सरकार के प्रति भरोसा जगाती है।