{"_id":"45b5b3400a1cf4d9fc1d050b7ad4ce60","slug":"message-of-peace-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":" शांति का संदेश","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
शांति का संदेश
नई दिल्ली
Updated Fri, 10 Oct 2014 08:44 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जब सीमा पर भारत-पाकिस्तान के बीच कटुता चरम पर है, तब कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई का नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना जाना सुखद आश्चर्य से तो भर ही देता है, इससे इन दोनों मुल्कों पर शांति स्थापित करने का नैतिक दबाव भी बनता है।
विज्ञापन
नोबेल समिति ने पुरस्कार के लिए दक्षिण एशिया के पड़ोसियों को तो चुना ही, यह संदेश भी दिया है कि शांतिपूर्ण वैश्विक विकास तभी संभव है, जब बच्चों और युवाओं का सम्मान हो। जहां तक कैलाश सत्यार्थी की उपलबि्धयों की बात है, तो बाल श्रम के खिलाफ करीब तीन दशकों के उनके अभियान के गांधीवादी तौर-तरीकों को खुद नोबेल समिति ने रेखांकित किया है।
विज्ञापन
बचपन में स्कूल के दरवाजे पर अपने पिता के साथ काम करते एक बच्चे की विवशता का इन पर ऐसा गहरा असर पड़ा कि बाद में अपनी जमी-जमाई नौकरी छोड़ वह बच्चों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराने के अपने अभियान में लग गए। उनकी पहल से दक्षिण एशिया में हजारों बच्चे स्कूलों में लौटे।
विज्ञापन
अपने यहां बच्चों को शिक्षा के अधिकार का कानून बना, तो उसके पीछे कैलाश सत्यार्थी का भी योगदान रहा है। उनकी इन उपलब्धियों के कारण ही इन्हें आधुनिक दास प्रथा खत्म करने वाले नायक के तौर पर देखा जाता है।
पाकिस्तान में लड़कियों की शिक्षा के लिए तालिबान से लोहा लेने वाली मलाला का हौसला तो और भी चौंकाने वाला है। इसकी कीमत उन्हें अपनी जान जोखिम में डालने, फिर पाकिस्तान से पलायन करने के रूप में चुकानी पड़ी है। नोबेल से सम्मानित होने वाली वह सबसे कम उम्र शख्सियत और दूसरी पाक नागरिक हैं।
महज सत्तरह की उम्र में मलाला को सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित करने के नोबेल समिति के फैसले को आश्चर्य के साथ भी देखा जा रहा है, पर जब दुनिया के कई हिस्से में कट्टरवादी हिंसा पसर रही है, तब पाकिस्तान के कबाइली इलाके में लड़कियों की शिक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा देने वाली एक किशोरी को सम्मानित करने का मतलब है।
नवाज शरीफ ने मलाला को पाकिस्तान का गौरव बताया है, पर इस शीर्ष सम्मान की गरिमा तो तभी है, जब मलाला की ससम्मान वतन वापसी हो।