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मंत्रिमंडल विस्तार का संदेश
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 09 Nov 2014 08:36 PM IST
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अपने पहले मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्रियों का चुनाव करते हुए नरेंद्र मोदी ने जहां योग्यता और निष्ठा का ध्यान रखा है, वहीं जातिगत, क्षेत्रीय और आगामी चुनावी समीकरणों को साधने की भी भरपूर कोशिश की है।
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मनोहर परिकर का मंत्री बनना तो पहले से ही तय था, जेपी नड्डा और चौधरी बीरेंद्र सिंह को कैबिनेट में लाकर प्रधानमंत्री ने उनकी निष्ठा, रणनीतिक क्षमता और अनुभव को महत्व दिया है। अलबत्ता सुरेश प्रभु को मंत्री बनाकर मोदी ने जो संदेश दिया है, वह ज्यादा ध्यान देने लायक है। जिन सुरेश प्रभु को दिवंगत बाल ठाकरे ने अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल से वापस बुला लिया था, उन्हें शिवसेना की आपत्ति के बावजूद सरकार में लाकर मोदी ने दोटूक संदेश दिया है कि बहुमत की ताकत से लैस भाजपा सहयोगी दलों के नाहक दबाव में नहीं आने वाली। बल्कि सुरेश प्रभु के भाजपा में शामिल होने और शिवसेना के मंत्रिमंडल विस्तार में मौजूद न रहने को इन दोनों दलों के खराब होते रिश्ते का निर्णायक मोड़ बताया जा रहा है।
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राज्यमंत्रियों में राजीव प्रताप रूडी, जयंत सिन्हा और गंगाराम अहीर जैसी शख्सियतें हैं, जिन्होंने कामकाज के जरिये अपनी अलग छवि बनाई है, तो पहली बार सांसद चुने गए कई लोगों को मंत्री बनाकर मोदी ने लीक से हटकर चलने के अपने स्वभाव का ही एक बार फिर परिचय दिया है। बेशक इन चयन के पीछे व्यक्तिगत निष्ठा ने भी बड़ी भूमिका निभाई है; विवादास्पद बयानों के लिए चर्चित गिरिराज सिंह को मंत्री बनाना इसका एक उदाहरण है।
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राजनीतिक समीकरणों का तो इस मंत्रिमंडल विस्तार में पूरा ध्यान रखा गया है। मसलन, आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बिहार और उत्तर प्रदेश को तरजीह दी गई है। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़ती पैठ और आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बाबुल सुप्रियो को मंत्री बनाया गया, तो तेलंगाना के इकलौते सांसद बंडारू दत्तात्रेय का भी ख्याल रखा गया है।
इक्कीस नए मंत्री चुनते हुए मोदी ने जहां गुजरात को जगह दी है, वहीं राजस्थान की शिकायत भी दूर कर दी है। लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार के पीछे चूंकि मंत्रालयों के संतुलित बंटवारे और बेहतर कामकाज का लक्ष्य है, इसलिए मंत्रिपद पाने को सिर्फ निष्ठा का पुरस्कार मान लेना भ्रामक होगा। बल्कि अब तो मंत्रियों के सामने कामकाज के बोझ का तर्क भी नहीं होगा।