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सख्त सजा का संदेश

Fri, 21 Mar 2014 07:55 PM IST
अमर उजाला नई दिल्ली
अमर उजाला नई दिल्ली Updated Fri, 21 Mar 2014 07:55 PM IST
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Message behind hard punishment
सख्त से सख्त सजा समाज से अपराध को पूरी तरह निर्मूल करने की गारंटी बेशक न हो, लेकिन निर्भया मामले के बाद यौन अपराधों से जुड़े कानून में संशोधन का न्यायिक फैसलों पर पड़ता असर स्वागतयोग्य है।
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मुंबई स्थित शक्ति मिल में गैंगरेप के पहले मामले में चार अभियुक्तों को सुनाई गई उम्रकैद की सजा इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है। सिर्फ यही नहीं कि यह पूरी न्यायिक कार्रवाई बहुत कम समय, लगभग सात महीने, में पूरी हुई, बल्कि फैसले के समय राज्य के गृह मंत्री का अदालत में मौजूद होना भी बहुत कुछ बता देता था।
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हालांकि यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बीते साल फोटो पत्रकार के साथ गैंगरेप के चौबीस घंटे के भीतर ही पुलिस ने एक नाबालिग को गिरफ्तार कर लिया था,और सप्ताह भर के भीतर सारे अपराधी धर लिए गए थे। उसी के बाद टेलीफोन ऑपरेटर के साथ हुए गैंगरेप का खुलासा हुआ था। इन दोनों मामलों में मुंबई पुलिस ने जितनी तत्परता दिखाई, सत्र अदालत की सक्रियता भी उतनी ही प्रशंसनीय रही।
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गैंगरेप के दूसरे मामले में अगले सप्ताह आने वाले फैसले पर इसीलिए उत्सुकता बढ़ गई है, क्योंकि इनमें से तीन आरोपी उस अपराध में भी शामिल थे, और इस कारण अभियोजन पक्ष भारतीय दंड संहिता की संशोधित धारा 376 (ई) के तहत इनकी फांसी की सजा की मांग कर रहा है।

करीब एक सप्ताह पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्भया मामले से जुड़े चार अभियुक्तों की फांसी की निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। ठीक इसी समय बांबे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने एक नाबालिग के साथ हुए गैंगरेप और हत्या की लगभग नौ साल पुरानी घटना में मुख्य अभियुक्त को फांसी की सजा सुनाते हुए साफ-साफ कहा है कि ऐसे भयानक अपराध को अंजाम देने वाला दया या संवेदना का पात्र नहीं हो सकता।


शक्ति मिल गैंगरेप के मामलों की सुनवाई के दौरान भी न्यायिक हलके में यह बहस तेज थी कि नाबालिग की उम्र सीमा घटाकर सोलह कर देनी चाहिए; उल्लेखनीय है कि मुंबई गैंगरेप के दोनों मामलों में दो अभियुक्त नाबालिग हैं! यौन अपराधों के खिलाफ समाज के बदलते रुख और इस न्यायिक सक्रियता को व्यापक नजरिये से देखने की जरूरत तो है ही, इसी से बेहतर बदलाव की उम्मीद भी बनती है।
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