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चिकित्सा शिक्षा की राह
नई दिल्ली
Updated Fri, 19 Jul 2013 09:13 PM IST
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देश के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में दाखिले की संयुक्त प्रवेश परीक्षा (नीट) की व्यवस्था को निरस्त करने वाले सर्वोच्च अदालत के फैसले ने चिकित्सा शिक्षा को गैरबराबरी के उसी चौराहे पर ला खड़ा किया है, जहां से चार वर्ष पहले शीर्ष अदालत ने एकल प्रवेश परीक्षा की राह दिखाई थी।
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असल में हाल के कुछ वर्षों में निजी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों की बाढ़-सी आ गई और वहां दाखिले के लिए चालीस लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक वसूले जाते थे, जिससे गरीब और वंचित तबके के बच्चों के लिए चिकित्सा शिक्षा की राह मुश्किल हो गई थी। नीट की व्यवस्था लागू होने से ऐसे निजी मेडिकल कॉलेजों पर अंकुश लग गया था; मगर सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद अब वे फिर से दाखिले की अपनी प्रक्रिया शुरू कर सकेंगे।
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निवर्तमान प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर के कार्यकाल के अंतिम दिन आए इस फैसले में न केवल भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) द्वारा नीट आयोजित करने की वैधानिकता पर सवाल उठाया गया, बल्कि अनुच्छेद 19(1)(जी) का हवाला देकर निजी मेडिकल कॉलेजों के संचालकों के व्यवसाय करने के सांविधानिक अधिकार को संरक्षित भी किया गया है।
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मगर इस फैसले से बहुत से प्रश्न अनुत्तरित रह गए हैं, जिनकी ओर फैसले पर असहमति जताने वाले न्यायमूर्ति ए आर दवे ने भी संकेत किया है। उन्होंने लिखा है कि नीट की व्यवस्था खत्म होने पर विभिन्न कॉलेजों में दाखिले से संबंधित प्रवेश परीक्षाओं के कारण गरीब और प्रतिभाशाली छात्रों को शारीरिक व आर्थिक तनाव झेलना पड़ेगा।
न्यायमू्र्ति कबीर और उनके साथ सहमति जताने वाले न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन ने अपने फैसले में नीट की अधिसूचना को निरस्त तो कर दिया, पर इस बात पर रोशनी नहीं डाली कि आखिर चार वर्ष पहले शीर्ष अदालत की ही एक दो-सदस्यीय बेंच ने सभी मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में दाखिले की एक समान व्यवस्था करने का कदम क्यों उठाया था?
एमसीआई की वैधानिकता तो अपनी जगह है, पर क्या मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए इंजीनियरिंग कॉलेजों जैसी व्यवस्था नहीं की जा सकती थी? मोटे तौर पर देखें, तो पुरानी व्यवस्था के लागू होने के बाद देश भर के मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में अब पचास से अधिक प्रवेश परीक्षाएं होंगी, जिसमें वही छात्र शामिल हो सकेंगे, जिनके पास साधन होंगे। मूल सिद्धांत है कि न्याय सिर्फ होना नहीं, बल्कि न्याय होता दिखना भी चाहिए।