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इस बगावत का मतलब

नई दिल्ली Updated Tue, 04 Nov 2014 07:31 PM IST
meaning of this revolt
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तमिलनाडु के वरिष्ठ कांग्रेस नेता जी के वासन ने ऐसे समय पार्टी से बगावत की है, जब पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जिससे पार्टी की परेशानी और बढ़नी ही है। हालांकि वासन का यह कदम पूरी तरह से तमिलनाडु की राजनीति पर केंद्रित है, जहां आय से अधिक संपत्ति के मामले में जयललिता को सजा सुनाए जाने के बाद हालात तेजी से बदले हैं।
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असल में, प्रदेश की दोनों बड़ी द्रविड़ पार्टियां- अन्नाद्रमुक और द्रमुक के नेता जिस तरह से भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया में घिरते जा रहे हैं, उससे प्रदेश के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। प्रदेश में डेढ़ साल बाद विधानसभा चुनाव होने हैं और यदि आने वाले समय में उच्च न्यायालय ने जयललिता की सजा बरकरार रखी और यदि टू जी स्पेक्ट्रम मामले में कनिमोझी, दयालु अम्मल और ए राजा को सजा सुना दी गई, तब तो इन दोनों पार्टियों के लिए विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का सामना करना मुश्किल हो जाएगा।

वहीं दूसरी ओर लोकसभा चुनाव में प्रदेश से एक भी सीट नहीं जीत सकी कांग्रेस की भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है। हालत यह थी कि पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम तक ने लोकसभा चुनाव में मैदान छोड़ दिया था। वासन का कहना है कि वह यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कांग्रेस तमिलनाडु में चार-पांच फीसदी वोटों तक सिमट जाए! वह कांग्रेस को कामराज युग में ले जाने का सपना देख रहे हैं।

जाहिर है, वासन यदि कोई नई पार्टी या गुट बनाते भी हैं, तो उसका स्वरूप वह उस तमिल मनिला कांग्रेस जैसा रखना चाहेंगे, जिसका गठन 18 वर्ष पूर्व उनके पिता जी के मूपनार ने कांग्रेस से बगावत करने के बाद किया था। मगर सवाल है कि क्या वह अपने पिता जैसा करिश्मा कर पाएंगे, जिन्होंने उस समय द्रमुक के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। फिर यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में कुछ छोटे दलों के साथ तालमेल करने वाली भाजपा भी इस दक्षिणी राज्य में अपना आधार मजबूत करने के लिए जोर लगा रही है।

मगर यह साफ है कि वासन ने यह कदम राजनीतिक समीकरणों को देखकर उठाया है, भले ही वह इसके लिए पार्टी नेतृत्व को जिम्मेदार ठहरा रहे हों। इसके साथ ही अभी यह देखना बाकी है कि लोकसभा चुनाव में दो अंकों में सिमट गई कांग्रेस में यह बगावत कहां तक जाएगी!
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