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वापसी का मतलब
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 17 Apr 2015 08:27 PM IST
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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी बहुचर्चित छुट्टी से करीब दो महीने बाद लौट जरूर आए हैं, पर न तो उनकी भावी भूमिका को लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ कहा गया है और न उन्होंने खुद अपनी रणनीति का खुलासा किया है। हालांकि सोमवार से शुरू हो रहे संसद सत्र से ठीक पहले उनकी मौजूदगी में होने वाली किसान रैली के जरिये कांग्रेस शायद यही संदेश देना चाहती है कि पार्टी उपाध्यक्ष नया मोर्चा संभालने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
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आत्मचिंतन से लौटे राहुल लोकसभा चुनाव के बाद से बेजान पड़ी कांग्रेस में कितनी जान फूंक पाते हैं, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन उससे पहले उनकी भावी भूमिका और चुनौतियों के बारे में जरूर बात की जा सकती है। देखने वाली बात यह भी होगी कि 'अज्ञातवास' में खुद राहुल ने खुद को कितना बदला है? कहने की जरूरत नहीं कि उनकी छवि एक अनमने नेता की बन चुकी है, जिसकी वजहें भी हैं। मसलन, उन्होंने आत्मचिंतन के लिए ऐसा वक्त चुना, जब बजट सत्र जैसा महत्वपूर्ण अवसर था। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर उनकी पार्टी को उनकी गैरमौजूदगी में संसद के बाहर और भीतर एनडीए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ा।
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राहुल की बड़ी चुनौती तो कांग्रेस के भीतर मचे घमासान को शांत करने की ही है। हालत यह है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उन्हें कमान सौंपे जाने का खुलेआम विरोध कर चुके हैं। हालांकि जयपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में जब उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया था, तभी साफ हो गया था कि वही पार्टी के अगले नेता होंगे। बेशक गांधी-नेहरू परिवार की परिक्रमा करने वाली पार्टी के भीतर 'सोनिया बनाम राहुल' का झगड़ा आम कांग्रेसियों को भी भ्रमित करने वाला लगता होगा। पर ऐसा लगता है कि निरंतर मिल रही चुनावी पराजयों के बाद भी पार्टी सबक लेने को तैयार नहीं है।
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वास्तव में राहुल को तीन मोर्चे पर काम करना होगा, पहला, पार्टी संगठन को गुटबाजी और चापलूसों से मुक्त कराना, दूसरा, समान विचार वाले विपक्षी दलों के साथ तालमेल करना और तीसरा, संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष के लिए खुद को तैयार करना। लाख टके का सवाल है कि क्या वह इसके लिए तैयार हैं?